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Thursday, 15 June 2017

#AMAZING FROZEN LEMONS#

AMAZING FROZEN LEMONS
It is high time we overlook the importance of lemon peels. These are said to have enormous amount of health benefits, including the ability to boost your immune system; lower cholesterol and even help to prevent cancer. 
The health benefits of lemon include treatment of throat infections, indigestion, constipation, dental problems, and fever, internal bleeding, rheumatism, burns, obesity, respiratory disorders, & more
This article will tell you more about its cancer killing properties…
Most likely, you only think of lemon juice as vitamin C ??
Not anymore!
The fruit juice contains mainly sugars and fruit acids, which are made mainly of citric acid. Lemon peel consists of two layers: the outermost layer (“zest”), which contains essential oils (6 percent) that are composed mostly of limonene (90 percent) and citral (5 percent), plus a small amount of cintronellal, alphaterpineol, linayl, and geranyl acetate. The inner layer contains no essential oil but instead houses a variety of bitter flavone glycosides and coumarin derivatives.
Lemons are an excellent source of vitamin C. In addition, they are a good source of vitamin B6, potassium, folic acid, flavonoids, and the important phytochemical limonene. A 3½-ounce (100 gram) serving is about 2 medium lemons and provides 29 calories, 1.1 grams of protein, 0.3 grams of fat, and 9.3 grams of carbohydrate, with 2.8 grams of fiber and 2.5 grams of natural sugars.
The phytochemical limonene, which is extracted from lemons, is currently being used in clinical trials to dissolve gallstones and is showing extremely promising anticancer activities.
What's the major advantage of using the whole lemon other than preventing waste & adding new taste to your dishes? 
Lemon peels contain as much as 5 to 10 times more vitamins than the lemon juice itself & that's what you've been wasting!
Lemon peels are health rejuvenators in eradicating toxic ‎elements in the body. As you know, the lemon tree is known for its varieties of lemons and limes. 
You can eat the fruit in different ways: you can eat the pulp, juice press, prepare drinks, sorbets, pastries, etc... It is credited with many virtues, but the most interesting is the effect it produces on cysts and tumors.
This plant is a proven remedy against cancers of all types. Some say it is very useful in all variants of cancer. It is considered also as an anti-microbial spectrum against bacterial infections and fungi, effective against internal parasites and worms, it regulates blood pressure which is too high, is an antidepressant, combats stress and nervous disorders.
‎The surprising benefits of lemon is the miraculous ability to kill cancer cells! It is 10,000 times stronger ‎than chemotherapy!!Now we should see how to use Amazing Frozen Lemons to get cure from Cancer. Actually the effective way is the consuming whole lemon fruit. Generally weight of the one lemon fruit is 110 g. Scientifically has found that 150g of lemon fruit should consume to heal cancer easily. The patient can use either peeled lemon or unpeel lemon. But the productive way is consumed the whole lemon fruit.
MAINTAIN PH BY AMAZING FROZEN LEMONS
Don’t forget to maintenance your pH value during cancer treating period specially.pH level is very important to healing cancer why carcinogen cell survive easily in the Acidic pH range so cancer patient should always keep their pH value at the Alkaline range. Then can survive and control the growth of the cancer cells further more.
You can understand PH value measuring by pH of the urine saliva. You can buy pH meter or pH papers for that. pH testing should be done either before 1 hr of the eating or after 2hrs of the eating.
We can represent below recipes for the every cancer patients, If you can be done this application during three months then you can heal your cancer problems easily and totally. Researchers has invented that it is very effective than chemotherapy treatments or radiotherapy or surgery processes.
Many professionals in restaurants and eateries are using or consuming the entire lemon and nothing is wasted.
As you know, the lemon tree is known for its varieties of lemons and limes. 
You can eat the fruit in different ways: you can eat the pulp, juice press, prepare drinks, sorbets, pastries, etc... It is credited with many virtues, but the most interesting is the effect it produces on cysts and tumors.
This plant is a proven remedy against cancers of all types. Some say it is very useful in all variants of cancer. It is considered also as an anti-microbial spectrum against bacterial infections and fungi, effective against internal parasites and worms, it regulates blood pressure which is too high, is an antidepressant, combats stress and nervous disorders.
How can you use the whole lemon without waste?
Simple...
Place the washed ORGANIC lemon in the freezer.
Once frozen, get your grater, & shred the whole lemon (no need to peel it) and sprinkle it on your foods! 
On vegetables, salad, ice cream, soup, cereals, noodles, spaghetti sauce, ‎rice, sushi, fish dishes, ... the list is endless. 
All the foods will get an unexpected wonderful taste!
Why do we not know about that? 
Because there are laboratories interested in making a synthetic version that will bring them huge profits. 
You can now help a friend in need by letting him/her know that lemon juice is beneficial in preventing the disease.
Its taste is pleasant and it does not produce the horrific effects of chemotherapy.
 How many people will die while this closely guarded secret is kept, so as not to jeopardize the multimillionaires large corporations? 
🍋🍋🍋🍋🍋‎
‎Request: Pls forward to lots of friends.‎
Please start using from today.

Tuesday, 13 June 2017

अलौकिक शक्ति,प्रेत आत्माओं के मौजूद होने संकेत,स्वप्नों से भविष्य संकेत

संसार में रहने वाला हर व्यक्ति जानता है कि कोई तो अलौकिक शक्ति है इस जहां में जो इस संसार की सत्ता का प्रतिनिधित्व कर रही है।इस संसार के प्रत्येक प्राणी का पालन पोषण कर रही है। ब्रह्माण्ड में निहित इस दैवीय शक्ति का यदि आपको साथ चाहिए जो आपको आने वाली हर बाधा से बचा सके तो आपको इस तरह दृढ़ विश्वास अपने मन में रखना होगा। निश्चय ही आपको कुछ ऐसे लक्षण या संकेत दृष्टिगोचर होंगे जो आपके विश्वास को और भी अधिक दृढ़ करने में आपकी सहायता करेंगें। 
श्रद्धा और विश्वास ------------/----------- अपने इष्ट पर श्रद्धा और विश्वास, ये दो ऐसे सौपान हैं जिनके फलस्वरूप ईश्वरीय सत्ता को पाया जा सकता है या उसका साक्षात्कार परमात्मा से हो सकता है या यूँ कहे कि उसे ब्रह्मांड के वास्तविक सत्य का ज्ञान हो सकता है। अतः अपने इष्ट पे से कभी अपने विश्वास को डिगने न दें।कितनी भी विषम परिस्थिति आ जाये मगर अपने ईश्वर पर से अपना विश्वास कोई भी कीमत पर न मिटने दे। क्योंकि ईश्वर कभी आपका बुरा नहीं कर सकता। जिसने जन्म दिया है उसने आपके लिए कुछ तो अच्छा ही सोचा होगा । संसार का इंसान फिर भी बुरे समय में आपका साथ छोड़ सकता है मगर आपका ईश्वर अपने चमत्कार तभी दिखाते हैं जब आपका समय बुरा होता है। जब तक पाण्डव बुरे दौर से गुज़र रहे थे तब तक भगवान कृष्ण हर समय उनके साथ रहे।इसीलिए आपके बुरे समय में आपका असली साथी केवल आपका अपना इष्टदेव ही होता है। 
अध्यात्मिक्ता ------------------------ अध्यात्म का अर्थ है अपनी आत्मा का अध्ययन करना, अपनी आत्मा की शक्ति को बढ़ाना या यूँ कहें कि ईश्वर की खोज करना। बहुत से मनुष्य अपना पूरा जीवन इसी खोज में लगा भी देते हैं। मगर ईश्वर को पाना इतना भी सहज नहीं होता है,मगर नामुमकिन भी नहीं होता है। ऐसा कौन होगा जो ईश्वर का सानिध्य नहीं पाना चाहता है, लेकिन ऐसे सौभाग्यशाली लोग बहुत कम ही हैं जिन्हें स्वयं ईश्वर अपना सानिध्य देने के लिए तैयार रहते हैं। परन्तु जिन पर गुरु की कृपा हो उनको ईश्वर का वरदान और सानिध्य अतिसहजता से मिल जाता है। आवश्यक है गुरु के प्रति अपना विश्वास और श्रद्धा बनाये रखने की। विश्वास ही अपनी मंज़िल तक पहुँचा सकता है। अतः अपने गुरु के प्रति समर्पण बनाये रखें। 
अज्ञानता ---------------------- कई ऐसे भी लोग होते हैं जिन पर जन्मजात ही ईश्वर की कृपा होती है,परन्तु वो इस बात से अनजान होते हैं। कई बार ऐसे लोगों के मुँह से निकली हर बात सत्य होती है या यूं कहें कि वो जो कहते हैं वह हर बात सही हो जाती है। ऐसे लोगों को संसार काली जुबान वाला भी कह सकते हैं। मगर ऐसे लोगो को स्वयं पर विचार करने की आवश्यकता होती हैं।इनको अपनी आत्मा पर ध्यान लगाना चाहिए। विचार करें कि कहीं आप उनमें से एकतो नहीं हैं, जिनके ऊपर ईश्वरीय सत्ता की सर्वोच्च शक्ति की कृपा है? विचार करें। ये प्रश्न एक ऐसा जटिल सवाल है जिसका जवाब वो लोग भी नहीं जानते, जिन पर ब्रह्माण्ड की इस दैवीय शक्ति का हाथ है। इसका कारण अध्यात्म की अज्ञानता है। संसार में जन्म लेने वाला साधारण सा दिखने वाला एक अदना सा व्यक्ति ये कैसे जानेगा कि कोई ऐसी शक्ति है जो हमेशा पल पल उसके साथ-साथ रहती है, और हमेशा उस पर आये संकट से उसे बचाती है। अक्सर ऐसे लोग गलत रास्तों के शिकार होकर अपना अनर्थ कर लेते हैं। कोई सिद्ध गुरु ही ये जान सकता है कि आपकी आत्मा कितनी सिद्ध है। अतः हमेशा अपने गुरु के प्रति समर्पित रहो। वैसे मैं कुछ लक्षण बताती हूँ यदि आपमें ऐसे कोई भी लक्षण दिखाई दे तो समझे की आप पर ईश्वर की अटूट कृपा है अतः लक्षण जानने के बाद अपने इष्ट के प्रति अपने विश्वास को दृढ़ करें। और हो सके तो ऐसे लोग नकारात्मक विचारों से सर्वथा दूर रहें। एक बात और ध्यान रहें यदि आपके आस पास भी इस तरह का कोई ईश्वरीय सत्ता की कृपा को पाया हुआ व्यक्ति दिखाई दे तो उससे कभी न उलझें, उनका आशीर्वाद ही लेने की कोशिश करें। यदि ऐसे लोगों पर आपका विश्वास न हो तो उनसे कभी तर्क वितर्क न करें। 
अलौकिक शक्ति------------तो चलिए आज हम आपको कुछ ऐसे लक्षणों या संकेतों के विषय में बताएंगे जो यह बताने के लिए काफी हैं कि कोई फरिश्ता या फिर कोई अलौकिक शक्ति हमेशा आपके साथ रहती है और आपको मुसीबतों से बचाती है।
सुनहरा प्रकाश ----------------------------- अगर आप अपने अंदर कभी कभी आँख बन्द करने पर या बुरे समय में या आपके आसपास बिना किसी कारण के सुनहरा प्रकाश या चमकती रोशनी दिखाई दे जो दिखने में बहुत ही सुन्दर और मन को शान्त करने वाली हो तो ऐसा जान लीजिए ईश्वरीय सत्ता की एक कृपा है जो आपके आसपास और आपकी सुरक्षा कर रही है, जो आपको कभी अकेलापन और मायूसी नहीं महसूस होने देती है।
बादल-------------कभी जमीन पर चलते हुए भी आपको ऐसा लगता है कि आपके आसपास बादल हैं, कभी आसमान के बादल आपको बहुत गहरे दिखने लगते हैं या फिर आपको धुंधला सा दिखना लगता है, तो निश्चय ही आप अपने मार्गदर्शक फरिश्ते के साथ हैं, वो आपको कभी हानि नहीं पहुंचाएगा बल्कि हर समय आपकी सहायता करेगा।
खुशबू------------कभी-कभार हमें अचानक से बहुत तेज खुशबू आने लगती है, लेकिन वह कहां से आ रही है ये बात समझ नहीं आती। ये खुशबू उसी दैवीय शक्ति की है जो आपके आसपास है।
बच्चों की खुशी
अगर कभी आपको दिखे कि कोई छोटा बच्चा छत की ओर देखकर हंस रहा है या दरवाजे की ओर देखकर खुश हो रहा है तो इसका अर्थ स्पष्ट है कि वह बच्चा किसी दैवीय ताकत का अनुभव कर रहा है। वह फरिश्ता उसकी रखवाली के लिए वहां मौजूद है।
संगीत---------------खुशबू के अलावा कभी आपको कोई मधुर और खूबसूरत धुन सुनाई देने लगती है, लेकिन आसपास उस धुन के बजने का कोई कारण नहीं होता। ये उसी दैवीय शक्ति की धुन है, वो आपके आसपास आपकी सुरक्षा के लिए मौजूद है। 
मोरपंख –---------------- अक्सर जिन पर कृष्ण की कृपा हो उनको सहज ही मोरपंख दिखाई देता रहता है। या यूं कहें कि मोरपंख उनके मन को बार बार अपनी और आकर्षित करता है। यदि ऐसा आपके साथ हो तो इसका अर्थ है कि कृष्ण की कृपा आपके ऊपर है और उनकी कोई दैवीय शक्ति आपके साथ-साथ है। अतः कृष्ण के प्रति अपना विश्वास और श्रद्धा बनाये रखें। हो सके तो हमेशा गीता के पाठ का अध्ययन करते रहें। इस कृपा के आप हमेशा पात्र बने रहेंगे। हाथी, सफ़ेद घोड़ा, रथ, देवी मां , शिवजी, कभी कभी कहीं से गुलाब की खुशबु, बांसुरी की मधुर ध्वनि भी सुनाई दे तो समझना कि ईश्वर की कोई शक्ति आपके साथ है।
सपनों की तह में जाएं तो भारतीय दर्शनशास्त्र कहता है कि सपने भूत, वर्तमान और भविष्य का सूक्ष्म आकार हैं। जो हर समय वायुमंडल में विद्यमान रहते हैं। जब व्यक्ति नींद में होता है तो सूक्ष्म आकार होकर इंसान की आत्मा अपने भूत और भविष्य से संपर्क स्थापित करती है।
चमकती रोशनी------------अगर आप अपने आसपास बिना किसी कारण के कोई चमकती रोशनी देखते हैं, कोई ऐसी रोशनी जो बहुत खूबसूरत है.... तो समझ जाइए कोई है आपके आसपास जो आपकी सुरक्षा कर रहा है, जो आपको कभी अकेला नहीं महसूस होने देगा।
हर मनुष्‍य के जीवन में कभी कभी ऐसा होता है जिससे ये महसूस होता है कि उसके आस पास कोई दैविय शक्ति है क्‍योंकि जब कोई व्‍यक्ति मुश्किल में होता है और उसके साथ कोई नहीं होता तो एक ऐसी शक्ति होती है जो उसे परिस्थितियों से लड़ने सिखाती है जिसे दैविय शक्ति भी कह सकते हैं। तो आइए जानते हैं कैसे प्राप्‍त कर सकते हैं इन शक्तियों को। 
इन संकेतों से जाने की आपके घर में भूत है के नहीं|
जिस तरह भिन्न-भिन्न चीजों के अलग-अलग संकेत (signal) होते है, ठीक उसी तरह प्रेत आत्माओं के मौजूद होने के भी कई संकेत होते है। विशेषज्ञों के अनुसार अगर इन संकेतों में से अगर आपको कोई भी संकेत का अहसास (feel) हो तो सावधान हो जाए। आइए जाने ये कौन से संकेत है जो आत्मा के वजूद की और इशारा करते है।
अजीबोगरीब आवाजे सुनाई देना: अगर आपको अजीबोगरीब जैसे कि किसी के चलने की, खुरचने की़, पायल की़, दरवाजा खटकाने (door knocking) की, कुछ गिरने की आदि आवाज़ें सुनाई दे, तो ये संकेत गलत हैं।
अचानक इत्र या परफ्यूम की खुशबू आना: घर में किसी ने भी इत्र, परफ्यूम (perfume) या खूशबू जैसी कोई भी चीज नहीं लगाई हो और उसके बावजूद अचानक (suddenly) ऐसी ही खुशबू आये, तो हो सकता है कोई प्रेत आत्मा आपके पास से गुजरी हो।
परछायीं का दिखना: आपको घर में कभी अजीब सी परछायीं (shadow) दिखाई दे, तो पहले इसकी पुष्टि कर ले की ये किसकी है। अन्यथा सावधान रहने की जरूरत है।
जब अचानक तेजी से बंद हो दरवाजा: घर में अगर कोई ऐसा कमरा (room) है, जिसके दरवाजे को हलका सा पुश करने से वह तेजी से बंद हो जाता हो तो ये संकेत भी अच्छा नहीं है। हो सकता है वहां कोई अदृश्य शक्ति (hidden power) का वास हो।
दीवारों पर खुर्चन या धब्बे: अगर घर की दीवार पर आपको खुर्चन या धब्बे दिखाई दें, तो ये भी गलत संकेत (bad signal) हो सकते हैं।
अपने स्थान पर न मिलें चीजें: अगर आप चीजों को संभाल कर रखते हैं, लेकिन फिर भी वे चीजें अपने स्थान पर नहीं मिलती हैं। और ऐसा बार-बार हो रहा है, तो जरूर कोई गड़बड़ है।
कोई बिस्तर पर बैठा हो: अचानक से आपको कभी लगे कि आपके खाली बेड (empty bed) पर कोई बैठा या लेटा है। और अगले ही पल में वो गायब सा हो जाता है। तो हो जाए सावधान।
कोई पीछा कर रहा हो: अगर आपको बार- बार महूसस हो रहा हो कि कोई ना कोई आपका पीछा कर रहा है, तो सर्तक हो जाए। ये कोई प्रेत आत्मा हो सकती है।
किसी चीज का अचानक गायब होना: कोई चीज अचानक गायब हो जाए और फिर से आंखों (eyes) के सामने आ जाए। तो ऐसी चीजे संभाल कर रखें, क्योंकि हो सकता है ये चीजें किसी अदृश्य शक्ति की पसंदीदा हो गई हो।
रोने और सिसकियों की आवाजें: अचानक किसी के रोने (crying) की या सिसकियां लेने की आवाज आये, लेकिन देखने पर आवाज वाली जगह कोई नहीं हो, तो सावधान हो जाए।
जैसे किसी ने छुआ हो: अगर अचानक लगे कि आपको किसी ने छुआ (touch) है। तो कोई न कोई गड़बड़ है।
घर में कुत्ता-बिल्ली का व्यवहार अजीब लगे: अगर घर में मौजूद जानवर (animals) जैसे कुत्ता या बिल्ली अचानक से अजीब सा व्यवहार (behavior) करने लगे या फिर अजीब-अजीब आवाज़ें निकालें, तो कुछ गड़बड है।
मनोवैज्ञानिक यह भी मानते हैं कि कभी-कभी स्वप्न भविष्य में होने वाली घटनाओं का भी संकेत देते हैं। स्वप्नों से भविष्य संकेत की पुष्टि कई प्राचीन ग्रंथों द्वारा होती है। ननिहाल में भरत ने एक स्वप्न देखा था जिसका परिणाम सामने आया।
त्रिजटा ने भी लंका के विध्वंस होने का स्वप्न देखा था। गौतम बुद्ध के जन्म से कुछ दिन पहले उनकी माता रानी माया ने स्वप्न में एक सूर्य सा चमकीला, 6 दांतों वाला सफेद हाथी देखा था, जिसका अर्थ राज्य के मनीषियों ने एक उच्च कोटि के जगत प्रसिद्ध राजकुमार के जन्म का सूचक बताया, जो सत्य हुआ। बाद में इसी राजकुमार ने बौद्ध धर्म की नींव रखी।
वैसे सुषुप्ति अवस्था में देखे गये स्वप्न सुबह तक याद नहीं रहते। यह आवश्यक नहीं कि स्वप्न में देखा गया सब कुछ अर्थपूर्ण हो। चिकित्सा शास्त्रियों के अनुसार जो व्यक्ति अनावश्यक इच्छाओं, चंचल भावनाओं, उच्च आकांक्षाओं और भूत-भविष्य की चिंता से अपने को मुक्त रखते हैं, वही गहरी निद्रा ले पाते हैं। गहरी नींद वाले लोगों का स्वास्थ्य अमूमन बेहतर रहता है।
महर्षि वेदव्यास ब्रह्मसूत्र के जरिये कहते हैं मस्तिष्क में पिछले जन्मों का ज्ञान सुषुप्त अवस्था में रहता है। शुद्ध आचरण वाले धार्मिक और शांत चित्त व्यक्ति के सपने, दैविक संदेशवाहक होने के कारण, सत्य होते हैं। स्वप्न भावी जीवन यात्रा से जुड़े शुभ और अशुभ प्रसंग विपत्ति, बीमारी और मृत्यु की पूर्व सूचना देते हैं।

Monday, 12 June 2017

क्या भविष्य में बच पाएगा केदारनाथ का मंदिर...

आश्चर्य चकित कर देने वाली प्रस्तुति क्या चार सो साल तक बर्फ में दबा रहा केदारनाथ मंदिर...पुनः प्रस्तुत


केदारनाथ ज्योतिर्लिंग-
केदारनाथ स्थित ज्योतिर्लिंग भगवान शिव के 12 प्रमुख ज्योतिर्लिंगों में आता है। यह उत्तराखंड राज्य के रूद्रप्रयाग जिले में स्थित है। बाबा केदारनाथ का यह मंदिर समुद्र तल से 3584 मीटर की ऊँचाई पर स्थित है। केदारनाथ का वर्णन स्कन्द पुराण एवं शिव पुराण में भी मिलता है। यह तीर्थ भगवान शिव को अत्यंत प्रिय है।
अगर वैज्ञानिकों की मानें तो केदारनाथ का मंदिर 400 साल तक बर्फ में दबा रहा था, लेकिन फिर भी वह सुरक्षित बचा रहा। 13वीं से 17वीं शताब्दी तक यानी 400 साल तक एक छोटा हिमयुग (Little Ice Age) आया था जिसमें हिमालय का एक बड़ा क्षेत्र बर्फ के अंदर दब गया था।
वैज्ञानिकों के मुताबिक केदारनाथ मंदिर 400 साल तक बर्फ में दबा रहा फिर भी इस मंदिर को कुछ नहीं हुआ, इसलिए वैज्ञानिक इस बात से हैरान नहीं है कि ताजा जल प्रलय में यह मंदिर बच गया।
देहरादून के वाडिया इंस्टीट्यूट के हिमालयन जियोलॉजिकल वैज्ञानिक विजय जोशी ने कहा कि 400 साल तक केदारनाथ के मंदिर के बर्फ के अंदर दबे रहने के बावजूद यह मंदिर सुरक्षित रहा, लेकिन वह बर्फ जब पीछे हटी तो उसके हटने के निशान मंदिर में मौजूद हैं जिसकी वैज्ञानिकों ने स्टडी की है उसके आधार पर ही यह निष्कर्ष निकाला गया है।
जोशी कहते हैं कि 13वीं से 17वीं शताब्दी तक यानी 400 साल तक एक छोटा हिमयुग आया था जिसमें हिमालय का एक बड़ा क्षेत्र बर्फ के अंदर दब गया था। मंदिर ग्लैशियर के अंदर नहीं था बल्कि बर्फ के ही दबा था।
वैज्ञानिकों के अनुसार मंदिर की दीवार और पत्थरों पर आज भी इसके निशान हैं। ये निशान ग्लैशियर की रगड़ से बने हैं। ग्लैशियर हर वक्त खिसकते रहते हैं। वे न सिर्फ खिसकते हैं बल्कि उनके साथ उनका वजन भी होता है और उनके साथ कई चट्टानें भी, जिसके कारण उनके मार्ग में आई हर वस्तुएं रगड़ खाती हुई चलती हैं। जब 400 साल तक मंदिर बर्फ में दबा रहा होगा तो सोचिए मंदिर ने इन ग्लैशियर के बर्फ और पत्थरों की रगड़ कितनी झेली होगी।
वैज्ञानिकों के मुताबिक मंदिर के अंदर भी इसके निशान दिखाई देते हैं। बाहर की ओर दीवारों के पत्थरों की रगड़ दिखती है तो अंदर की ओर पत्थर समतल हैं, जैसे उनकी पॉलिश की गई हो। 
मंदिर का निर्माण : विक्रम संवत् 1076 से 1099 तक राज करने वाले मालवा के राजा भोज ने इस मंदिर को बनवाया था, लेकिन कुछ लोगों के अनुसार यह मंदिर 8वीं शताब्दी में आदिशंकराचार्य ने बनवाया था। बताया जाता है कि मौजूदा केदारनाथ मंदिर के ठीक पीछे पांडवों ने एक मंदिर बनवाया था, लेकिन वह मंदिर वक्त के थपेड़ों की मार नहीं झेल सका।भगवान श्री कृष्ण के कहने पर पांण्डव शिव जी को मनाने चल पड़े। पांण्डवों द्वारा अपने गुरूओं एवं सगे-संबंधियों का वध किये जाने से भगवान शिव जी पांण्डवों से नाराज हो गये थे । गुप्त काशी में पांण्डवों को देखकर भगवान शिव वहां से विलीन हो गये और उस स्थान पर पहुंच गये जहां पर वर्तमान में केदारनाथ स्थित है। लेकिन पांण्डव भगवान शिव को हर हाल में मनाना चाहते थे। शिव जी का पीछा करते हुए पांण्डव केदारनाथ पहुंच गये। इस स्थान पर पांण्डवों को आया हुए देखकर भगवान शिव ने एक बैल का रूप धारण किया और इस क्षेत्र में चर रहे बैलों के झुंण्ड में शामिल हो गये। पांण्डवों ने बैलों के झुंण्ड में भी शिव जी को पहचान लिया तो शिव जी बैल के रूप में ही धरती में समाने लगे। भगवान शिव को बैल के रूप में धरती में समाता देख भीम ने कमर से कसकर पकड़ लिया। 
पांण्डवों की सच्ची श्रद्धा को देख भगवान शिव प्रकट हुए और पांण्डवों को पापों से मुक्त कर दिया। ऐसा माना जाता है कि भगवान शिव जी जब बैल के रूप में धरती में समा रहे थे तो उनका सिर काठमांडू स्थित पशुतिनाथ में प्रकट हुआ। अब बहां पशुपतिनाथ का भव्य मंदिर है। इसलिए केदारनाथ और पशुपतिनाथ को मिलाकर एक ज्योर्तिलिंग भी कहा जाता है। केदरनाथ में बैल के पीठ रूप में शिवलिंग की पूजा होती है जबकि पशुपतिनाथ में बैल के सिर के रूप में शिवलिंग को पूजा जाता है। 
वैसे गढ़वाल ‍विकास निगम अनुसार मौजूदा मंदिर 8वीं शताब्दी में आदिशंकराचार्य ने बनवाया था। यानी छोटा हिमयुग का दौर जो 13वीं शताब्दी में शुरू हुआ था उसके पहले ही यह मंदिर बन चुका था।
लाइकोनोमेट्री डेटिंग : 
वाडिया इंस्टीट्यूट के वैज्ञानिकों ने केदारनाथ इलाके की लाइकोनोमेट्री डेटिंग भी की।जवाब लाइकेन में छिपा है: कवक (फंजाई) और शैवाल (एल्गी) के मेल से सैकड़ों वर्षों में धीरे-धीरे पनपा यह पौधा बेहद ठंडे मौसम में जीवित रह सकता है. घाटी में ग्लेशियर के खिसकने के बाद बचे चट्टानी अवशेषों पर उपजे लाइकेन के अध्ययन से हमें बीते समय में ग्लेशियरों की गतिविधियों के बारे में जानकारी मिली. ऐसे कई सबूत मिले जिसे देखकर हम हैरान रह गए कि मंदिर 14वीं सदी के मध्य से सन् 1748 तक की करीब 400 साल की अवधि के दौरान एक विशालकाय बर्फ के पहाड़ तले दबा था 
जोशी ने कहा कि सबसे बड़ी बात यह है कि लाखों साल पहले केदारनाथ घाटी बनी है चोराबरी ग्लैशियर के पीछे हटने से। जब ग्लैशियर पीछे हटते हैं तो वे रोड रोलर की तरह अपने नीचे की सारी चट्टानों को पीस देते हैं और साथ में बड़ी-बड़ी चट्टानों के टुकड़े छोड़ जाते हैं।
जोशी कहते हैं कि ऐसी जगह में मंदिर बनाने वालों की एक कला थी। उन्होंने एक ऐसी जगह और एक ऐसा सेफ मंदिर बनाया कि आज तक उसे कुछ नुकसान नहीं हुआ। लेकिन उस दौर के लोगों ने ऐसी संवेदनशील जगह पर आबादी भी बसने दी तो स्वाभाविक रूप से वहां नुकसान तो होना ही था।
मजबूत है केदारनाथ का मंदिर : वैज्ञानिक डॉ. आरके डोभाल भी इस बात को दोहराते हैं। डोभाल कहते हैं कि मंदिर बहुत ही मजबूत बनाया गया है। मोटी-मोटी चट्टानों से पटी है इसकी दीवारें और उसकी जो छत है वह एक ही पत्थर से बनी है।
85 फीट ऊंचा, 187 फीट लंबा और 80 फीट चौड़ा है केदारनाथ मंदिर। इसकी दीवारें 12 फीट मोटी है और बेहद मजबूत पत्थरों से बनाई गई है। मंदिर को 6 फीट ऊंचे चबूतरे पर खड़ा किया गया है। यह हैरतअंगेज है कि इतने भारी पत्थरों को इतनी ऊंचाई पर लाकर तराशकर कैसे मंदिर की शक्ल ‍दी गई होगी।केदारनाथ मंदिर को जिसने बनवाया, जिन कारीगरों-मिस्त्रियों ने इसकी सरंचना सोची उन्होंने नींव के नाते चट्टान और फिर कंगूरे की संरचना तक में यह हिसाब बाकायदा लगाया कि यदि बाढ़ और बर्फानी तूफान आया तो मंदिर कैसे बचेगा? और यह सोचा गया था हजार साल पहले....... जानकारों का मानना है कि पत्थरों को एक-दूसरे में जोड़ने के लिए इंटरलॉकिंग तकनीक का इस्तेमाल किया गया होगा। यह मजबूती और तकनीक ही मंदिर को नदी के बीचोबीच खड़े रखने में कामयाब हुई है।
क्या भविष्य में बच पाएगा केदारनाथ का मंदिर...
केदार घाटी : केदानाथ धाम और मंदिर तीन तरफ पहाड़ों से घिरा है। एक तरफ है करीब 22 हजार फुट ऊंचा केदारनाथ तो दूसरी तरफ है 21 हजार 600 फुट ऊंचा खर्चकुंड और तीसरी तरफ है 22 हजार 700 फुट ऊंचा भरतकुंड। न सिर्फ तीन पहाड़ बल्कि पांच ‍नदियों का संगम भी है यहां। मं‍दाकिनी, मधुगंगा, क्षीरगंगा, सरस्वती और स्वर्णगौरी। इन नदियों में से कुछ को काल्पनिक माना जाता है। इस इलाके में मंदाकिनी ही स्पष्ट तौर पर दिखाई देती है। यहां सर्दियों में भारी बर्फ और बारिश में जबरदस्त पानी।
भविष्य की आशंका : दरअसल केदारनाथ का यह इलाका चोराबरी ग्लैशियर का एक हिस्सा है। वैज्ञानिकों का कहना है कि ग्लैशियरों के लगातार ‍पिघलते रहने और चट्टानों के खिसकते रहने से आगे भी इस तरह का जलप्रलय या अन्य प्राकृतिक आपदाएं जारी रहेंगी।
पुराणों की भविष्यवाणी : पुराणों की भविष्यवाणी अनुसार इस समूचे इलाके के तीर्थ लुप्त हो जाएंगे। माना जाता है कि जिस दिन नर और नारायण पर्वत आपस में मिल जाएंगे, बद्रीनाथ का मार्ग पूरी तरह बंद हो जाएगा। भक्त बद्रीनाथ के दर्शन नहीं कर पाएंगे। उत्तराखंड में आई प्राकृतिक आपदा इस बात की ओर इशारा करती है। पुराणों अनुसार आने वाले कुछ वर्षों में वर्तमान बद्रीनाथ धाम और केदारेश्वर धाम लुप्त हो जाएंगे और वर्षों बाद भविष्य में भविष्यबद्री नामक नए तीर्थ का उद्गम होगा।

Sunday, 11 June 2017

#👍*MEDICAL FITNESS*💐#

*MEDICAL FITNESS*

*PREVENTION IS* *BETTER THAN CURE*

____MEDICAL FITNESS____

*BLOOD PRESSURE*
120/80 -- Normal
130/85 -- Normal (Control)
140/90 -- High
150/95 -- V.High
*PULSE*
72 per minute (standard)
60 -- 80 p.m. (Normal)
40 -- 180 p.m. (abnormal)
*TEMPERATURE*
98.4 F Normal
99.0 F Above (Fever)

*BLOOD GROUP*
*COMPATIBILITY*

What’s Your Type and how common is it?
*O+* 1 in 3 37.4% (Most common)
*A+* 1 in 3 35.7%
*B+* 1 in 12 8.5%
*AB+* 1 in 29 3.4%
*O-* 1 in 15 6.6%
*A-* 1 in 16 6.3%
*B-* 1 in 67 1.5%
*AB-* 1 in 167 .6%
(Rarest)
*Compatible Blood Types*
O- can receive *O-*
O+ can receive *O+, O-*
A- can receive *A-, O-*
A+ can receive *A+, A-, O+, O-*
B- can receive *B-, O-*
B+ can receive *B+, B-, O+, O-*
AB- can receive *AB-, B-, A-, O-*
AB+ can receive *AB+, AB-, B+, B-, A+, A-, O+, O-*
This is an important message which can save a life! A life could be saved...
What is your blood group ?
Share the fantastic information..
*EFFECT OF WATER*

We Know - Water is
important but never tried to know about the SPECIAL TIMES one has to drink it.. !!!
*DO YOU KNOW ?*
Drinking 1 Glass of Water at the Right Time Maximizes its effectiveness on the Human Body;
*1 Glass of Water*
after waking up - helps to
activate internal organs..
*1 Glass of Water*
30 Minutes before a Meal -
helps digestion..
*1 Glass of Water*
before taking a Bath - helps
lower your blood pressure.
*1 Glass of Water*.
before going to Bed - avoids
STROKE or Heart Attack.
*👍When someone shares something of value with you and you benefit from it,💐*
*🙏🏽You have a moral*
*obligation to share*
Please forward to CONTACTS
❣❣❣🙏🏽🙏🏽🙏🏽❣❣❣

#Secure-Health#प्रतिदिन क्या करें#

*1.* प्रतिदिन 10 से 30 मिनट टहलने की आदत बनायें.
चाहे समय ना हो तो घर मे ही टहले , टहलते समय चेहरे पर मुस्कराहट रखें.


*Secure Health*

🌟 *2.* प्रतिदिन कम से कम 10 मिनट चुप रहकर बैठें.

*Secure Health*

🌟 *3.* पिछले साल की तुलना में इस साल ज्यादा पुस्तकें पढ़ें.क्या करें

*Secure Health*

🌟 *4.* 70 साल की उम्र से अधिक आयु के बुजुर्गों और 6 साल से कम आयु के बच्चों के साथ भी कुछ समय व्यतीत करें. D

*Secure Health*

🌟 *5.* प्रतिदिन खूब पानी पियें.

*Secure Health*

🌟 *6.* प्रतिदिन कम से कम तीन बार ये सोचे की मैने आज कुछ गलत तो नही किया.

*Secure Health*

🌟 *7.* गपशप पर अपनी कीमती ऊर्जा बर्बाद न करें.

*Secure Health*

🌟 *8.* अतीत के मुद्दों को भूल जायें, अतीत की गलतियों को अपने जीवनसाथी को याद न दिलायें.

*Secure Health*

🌟 *9.* एहसास कीजिये कि जीवन एक स्कूल है और आप यहां सीखने के लिये आये हैं. जो समस्याएं आप यहाँ देखते हैं, वे पाठ्यक्रम का हिस्सा हैं.

*Secure Health*

🌟 *10.* एक राजा की तरह नाश्ता, एक राजकुमार की तरह दोपहर का भोजन और एक भिखारी की तरह रात का खाना खायें.

*Secure Health*

🌟 *11.* दूसरों से नफरत करने में अपना समय व ऊर्जा बर्बाद न करें. नफरत के लिए ये जीवन बहुत छोटा है.

*Secure Health*

🌟 *12.* आपको हर बहस में जीतने की जरूरत नहीं है, असहमति पर भी अपनी सहमति दें.

*Secure Health*

🌟 *13.* अपने जीवन की तुलना दूसरों से न करें.

*Secure Health*


🌟 *14.* गलती के लिये गलती करने वाले को माफ करना सीखें.

*Secure Health*

🌟 *15.* ये सोचना आपका काम नहीं कि दूसरे लोग आपके बारे में क्या सोचते हैं.

*Secure Health*

🌟 *16.* समय ! सब घाव भर देता है.

*Secure Health*

🌟 *17.* ईर्ष्या करना समय की बर्बादी है. जरूरत का सब कुछ आपके पास है.

*Secure Health*

🌟 *18.* प्रतिदिन दूसरों का कुछ भला करें.

*Secure Health*

🌟 *19.* जब आप सुबह जगें तो अपने माता-पिता को धन्यवाद दें, क्योंकि माता-पिता की कुशल परवरिश के कारण आप इस दुनियां में हैं.

*Secure Health*

🌟 *20.* हर उस व्यक्ति को ये संदेश शेयर करें जिसकी आप परवाह करते हैं.
.l💞🌷🌹🙏🏻🙏🏻

Saturday, 10 June 2017

#स्ट्रोक की पहचान --और इस से पहले हमेशा याद रखिये ----STR#

डा महेश सिन्हा की एक बहुत उपयोगी पोस्ट ---
मस्तिष्क आघात के मरीज़ को कैसे पहचानें? 
मस्तिष्क आघात --जी वही, जिसे कईं बार ब्रेन-स्ट्रोक भी कह दिया जाता है अथवा आम भाषा में दिमाग की नस फटना या ब्रेन-हैमरेज भी कह देते हैं।
इस के बारे में पोस्ट डाक्टर साहब लिखते हैं ---- 
एक पार्टी चल रही थी, एक मित्र को थोड़ी ठोकर सी लगी और वह गिरते गिरते संभल गई और अपने आस पास के लोगों को उस ने यह कह कर आश्वस्त किया कि सब कुछ ठीक है, बस नये बूट की वजह से एक ईंट से थोड़ी ठोकर लग गई थी। (आस पास के लोगों ने ऐम्बुलैंस बुलाने की पेशकश भी की).
साथ में खड़े मित्रों ने उन्हें साफ़ होने में उन की मदद की और एक नई प्लेट भी आ गई। ऐसा लग रहा था कि इन्ग्रिड थोड़ा अपने आप में नहीं है लेकिन वह पूरी शाम पार्टी तो एकदम एन्जॉय करती रहीं। बाद में इन्ग्रिड के पति का लोगों को फोन आया कि कि उसे हस्पताल में ले जाया गया लेकिन वहां पर उस ने उसी शाम को दम तोड़ दिया।
दरअसल उस पार्टी के दौरान इन्ग्रिड को ब्रेन-हैमरेज हुआ था --अगर वहां पर मौजूद लोगों में से कोई इस अवस्था की पहचान कर पाता तो आज इन्ग्रिड हमारे बीच होती।
ठीक है ब्रेन-हैमरेज से कुछ लोग मरते नहीं है --लेकिन वे सारी उम्र के लिये अपाहिज और बेबसी वाला जीवन जीने पर मजबूर तो हो ही जाते हैं।
जो नीचे लिखा है इसे पढ़ने में केवल आप का एक मिनट लगेगा ---
स्ट्रोक की पहचान ---
एक न्यूरोलॉजिस्ट कहते हैं कि अगर स्ट्रोक का कोई मरीज़ उन के पास तीन घंटे के अंदर पहुंच जाए तो वह उस स्ट्रोक के प्रभाव को समाप्त (reverse)भी कर सकते हैं---पूरी तरह से। उन का मानना है कि सारी ट्रिक बस यही है कि कैसे भी स्ट्रोक के मरीज़ की तुरंत पहचान हो, उस का निदान हो और उस को तीन घंटे के अंदर डाक्टरी चिकित्सा मुहैया हो, और अकसर यह सब ही अज्ञानता वश हो नहीं पाता।
स्ट्रोक के मरीज़ की पहचान के लिये तीन बातें ध्यान में रखिये --और इस से पहले हमेशा याद रखिये ----STR.
डाक्टरों का मानना है कि एक राहगीर भी तीन प्रश्नों के उत्तर के आधार पर एक स्ट्रोक के मरीज की पहचान करने एवं उस का बहुमूल्य जीवन बचाने में योगदान कर सकता है.......इसे अच्छे से पढ़िये और मन में बैठा लीजिए --
S ---Smile आप उस व्यक्ति को मुस्कुराने के लिये कहिए।
T-- talk उस व्यक्ति को कोई भी सीधा सा एक वाक्य बोलने के लिये कहें जैसे कि आज मौसम बहुत अच्छा है।
R --- Raise उस व्यक्ति को दोनों बाजू ऊपर उठाने के लिये कहें।
अगर इस व्यक्ति को ऊपर लिखे तीन कामों में से एक भी काम करने में दिक्कत है , तो तुरंत ऐम्बुलैंस बुला कर उसे अस्पताल शिफ्ट करें और जो आदमी साथ जा रहा है उसे इन लक्षणों के बारे में बता दें ताकि वह आगे जा कर डाक्टर से इस का खुलासा कर सके।
नोट करें ---- स्ट्रोक का एक लक्षण यह भी है --
1. उस आदमी को जिह्वा (जुबान) बाहर निकालने को कहें।
2. अगर जुबान सीधी बाहर नहीं आ रही और वह एक तरफ़ को मुड़ सी रही है तो भी यह एक स्ट्रोक का लक्षण है।
एक सुप्रसिद्ध कार्डियोलॉजिस्ट का कहना है कि अगर इसको पढ़ने वाला इसे आगे दस लोगों को भेजे तो शर्तिया तौर पर आप एक बेशकीमती जान तो बचा ही सकते हैं ....
स्ट्रोक क्या है, क्यों होता है, और इस के लक्षण क्या हैं
मस्तिष्क के ठीक काम करने के लिए यह जरूरी है कि मस्तिष्क में खून की सप्लाई ठीक रहे. इस काम के लिए हमारे मस्तिष्क में रक्त वाहिकाओं (खून की नलिकाएं, blood vessels) का एक जाल (नेटवर्क) है, जिसे वैस्कुलर सिस्टम कहते है. ये रक्त वाहिकाएं मस्तिष्क के हर भाग में आक्सीजन और जरूरी पदार्थ पहुंचाती हैं.
स्ट्रोक में इस रक्त प्रवाह में रुकावट होती है. इस के दो मुख्य कारण हैं:
अरक्तक आघात, इस्कीमिया (ischemia): रक्त का थक्का (clot) रक्त वाहिका को बंद कर सकता है (अधिकाँश स्ट्रोक के केस इस प्रकार के होते हैं)[1]
रक्तस्रावी आघात (हेमरेज, haemorrhage) : रक्त वाहिका फट सकती है
खून सप्लाई में कमी के कुछ कारण
इस रुकावट के कारण हुई हानि इस पर निर्भर है कि मस्तिष्क के किस भाग में और कितनी देर तक रक्त ठीक से नहीं पहुँच पाया. यदि कुछ मिनट तक रक्त नहीं पहुँचता, तो प्रभावित भाग में मस्तिष्क के सेल मर सकते हैं (इस को इनफार्क्ट या रोधगलितांश कहते हैं).
स्ट्रोक से बचने के उपाय
स्ट्रोक होने के बाद व्यक्ति को दुबारा स्ट्रोक होने की संभावना बहुत बढ़ जाती है. कुछ स्टडीज़ के अनुसार, इलाज न करें तो अगले पांच साल में फिर स्ट्रोक होने की संभावना 25% है, और दस साल में स्ट्रोक होने की संभावना 40% है. इसलिए स्ट्रोक के बाद आगे स्ट्रोक न हो, इस के लिए खास ध्यान रखना होता है.
स्ट्रोक की संभावना कम करने के लिए उपयुक्त दवा लें और उचित जीवन-शैली के बदलाव अपनाएं. उच्च रक्त-चाप (हाइपरटेंशन, हाई बी पी) और कोलेस्ट्रॉल को नियंत्रित रखें. डायबिटीज से बचें, या उस पर नियंत्रण रखें. जीवन-शैली बदलाव करें, जैसे कि: सही और पौष्टिक खाना, वजन नियंत्रित रखना, शारीरिक रूप से सक्रिय रहना (व्यायाम इत्यादि), तम्बाकू सेवन और धूम्रपान बंद करना, तनाव कम करना, और मद्यपान कम करना. डॉक्टर से बात करें, ताकि आपको सही सलाह मिले.
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Thursday, 1 June 2017

#मोबाइल से जुडी कई बातें#


Mobile आज के समय में मोबाइल हर किसी की जिन्दगी का एक महत्वपूर्ण अंग बन चूका है मोबाइल तो सभी इस्तेमाल करते हैं क्या आपको पता है मोबाइल फ़ोन के कुछ ऐसे तथ्य हैं जिनको जानकार आपन दंग रह जायेंगे चलिए जानते हैं मोबाइल के बारे में कुछ दिलचस्प जानकारी 
#मोबाइल से जुडी कई ऐसी बातें जिनके बारे में हमें जानकारी नहीं होती लेकिन मुसीबत के वक्त यह मददगार साबित होती है ।#
इमरजेंसी नंबर ---
दुनिया भर में मोबाइल का इमरजेंसी नंबर 112 है । अगर आप मोबाइल की कवरेज एरिया से बाहर हैं
तो 112 नंबर द्वारा आप उस क्षेत्र के नेटवर्क को सर्च कर लें। ख़ास बात यह है कि यह नंबर तब भी काम करता है जब आपका की पैड लौक हो। 
जान अभी बाकी है---
मोबाइल जब बैटरी लो दिखाए और उस दौरान जरूरी कॉल करनी हो, ऐसे में आप *3370# डायल करें । आपका मोबाइल फिर से चालू हो जायेगा और आपका सेलफोन बैटरी में 50 प्रतिशत का इजाफा दिखायेगा। मोबाइल का यह रिजर्व दोबारा चार्ज हो जायेगा जब आप अगली बार मोबाइल को हमेशा की तरह चार्ज करेंगे। 
मोबाइल चोरी होने पर---
मोबाइल फोन चोरी होने की स्थिति में सबसे पहले जरूरत होती है, फोन को निष्क्रिय करने की ताकि चोर उसका दुरुपयोग न कर सके । अपने फोन के सीरियल नंबर को चेक करने के लिए *#06# दबाएँ । इसे दबाते ही आपकी स्क्रीन पर 15 डिजिट का कोड नंबर आयेगा। इसे नोट कर लें और किसी सुरक्षित स्थान पर रखें। जब आपका फोन खो जाए उस दौरान अपने सर्विस प्रोवाइडर को ये कोड देंगे तो वह आपके हैण्ड सेट को ब्लोक कर देगा।
कार की चाभी खोने पर ---
अगर आपकी कार की रिमोट की लेस इंट्री है। और गलती से आपकी चाभी कार में बंद रह गयी है। और दूसरी चाभी घर पर है। तो आपका मोबाइल काम आ सकता है। घर में किसी व्यक्ति के मोबाइल फोन पर कॉल करें। घर में बैठे व्यक्ति से कहें कि वह अपने मोबाइल को होल्ड रखकर कार की चाभी के पास ले जाएँ और चाभी के अनलॉक बटन को दबाये। साथ ही आप अपने मोबाइल फोन को कार के दरवाजे के पास रखें....। दरवाजा खुल जायेगा।
एंड्राइड मोबाइल यूजर के काम के कोड
1. Phone Information, Usage and Battery – *#*#4636#*#*
2. IMEI Number – *#06#
3. Enter Service Menu On Newer Phones – *#0*#
4. Detailed Camera Information –*#*#34971539#*#*
5. Backup All Media Files –*#*#273282*255*663282*#*#*
6. Wireless LAN Test –*#*#232339#*#*
7. Enable Test Mode for Service –*#*#197328640#*#*
8. Back-light Test – *#*#0842#*#*
9. Test the Touchscreen –*#*#2664#*#*
10. Vibration Test –*#*#0842#*#*
11. FTA Software Version –*#*#1111#*#*
12. Complete Software and Hardware Info –*#12580*369#
13. Diagnostic Configuration –*#9090#
14. USB Logging Control –*#872564#
15. System Dump Mode –*#9900#
16. HSDPA/HSUPA Control Menu –*#301279#
17. View Phone Lock Status –*#7465625#
18. Reset the Data Partition to Factory State – *#*#7780#*#*
सेमसंग शॉर्टकट कोड्स व उनसे मिलने वाली जानकारी
1. *2767*3855# - ये कोड आपके फोन को पूरी तरह क्लीन कर देगा साथ ही आपके फोन के सोफ्टवेयर को पुन: स्थापित कर देगा।
2. *#*#34971539#*#* - ये कोड आपको आपके कैमरे की पूरी जानकारी देगा।
3. *#*#7594#*#* - ये कोड आपके पावर बटन की तरह काम करेगा, इस कोड के जरिए आप अपना मोबाइल डायरेक्ट बंद कर सकते है।
4. *#*#0*#*#* - ये कोड LCD टेस्ट के लिए इस्तेमाल किया जाता है।
5. *#*#0673#*#* OR *#*#0289#*#* - ये कोड आपके मोबाइल का ऑडियो टेस्ट करता है।
6. *#*#2663#*#* - ये कोड आपको आपके मोबाइल का टच स्क्रीन वर्जन बताएगा।
7. *#*#3264#*#* - ये कोड आपको आपके मोबाइल का रेम वर्जन बताएगा।
8. *#*#232331#*#* - इस कोड से आप अपने मोबाइल का ब्लूटूथ टेस्ट कर सकते है।
9. *#*#44336#*#* - इस कोड से आप अपने मोबाइल के समय का निर्माण कर सकते है तथा अपने नम्बरो की सूची भी बदल सकते है
बड़े काम के कोड है इसलिए शेयर करे और दुसरो को भी बताये !

#Our Journey Together is so Short#

#"Our Journey Together is so Short"# 
A beautiful message for all of us....Take a minute please

 Life’s journey is too short than for you to go about moody, grumpy or with a heavy heart. You must therefore fight off and overcome whatever the devil has been using against you to make you unhappy.
A young lady sat in a bus. At the next stop a loud and grumpy old lady came and sat by her. She squeezed into the seat and bumped her with her numerous bags. 
The person sitting on the other side of the young lady got upset, asked her why she did not speak up and say something.
The young lady responded with a smile: 
"It is not necessary to be rude or argue over something so insignificant, the journey together is so short. I get off at the next stop."
This response deserves to be written in golden letters:
*"It is not necessary to argue over something so insignificant, our journey together is so short"*
If each one of us realized that our time here is so short; that to darken it with quarrels, futile arguments, not forgiving others, discontentment and a fault finding attitude would be a waste of time and energy.
As a child of God, you should emulate Christ Jesus and win others to Him with your Christlike behaviour at home, at school, in your place of work, at office, in your business and wherever you find yourself.
It is not necessary to argue over something so insignificant, our journey together is so short.
If each one could realise that our passage down here has such a short duration, to darken it with futile arguments would be a waste of time and energy.
Did someone break your heart? *Be calm, the journey is so short.*
Did someone betray, bully, cheat or humiliate you? *Be calm, forgive, the journey is so short.*
Whatever troubles anyone brings us, let us remember that *our journey together is so short.*
No one knows the duration of this journey. No one knows when their stop will come. *Our journey together is so short.*

Let us cherish friends and family. Let us be respectful, kind and forgiving to each other. Let us be filled with gratitude and gladness. 
If I have ever hurt you, I ask for your forgiveness. If you have ever hurt me, you already have my forgiveness. 
After all, *Our Journey Together is so Short!*
Always remember: The journey down here is so short!!! We will spend longer time together in heaven, so do all in your power to make it to heaven. I pray that the Lord will count each one of us worthy in His Kingdom in Jesus name. Amen.

#Sun-Upasana# सूर्योपासना से क्या लाभ -सूर्य अर्घ्य देने की विधि


सूर्योपासना(Sun Upasana) से क्या लाभ मिलता है।

सूर्यदेव को अर्घ्य देने की परम्परा प्राचीन काल से ही चली आ रही है। छठ ब्रत में उगते हुए सूर्य को तथा अस्तांचल सूर्य को अर्घ्य दिया जाता है। यदि आपके जन्मकुंडली में सूर्य ग्रह नीच के राशि तुला में है तो अशुभ फल से बचने के लिए प्रतिदिन सूर्य देव को अर्घ्य देना चाहिए। वही यदि सूर्य किसी अशुभ भाव का स्वामी होकर सुबह स्थान में बैठा है तो सूर्योपासना करनी चाहिए। साथ ही जिनकी कुंडली में सूर्यदेव अशुभ ग्रहो यथा शनि, राहु-केतु, के प्रभाव में है तो वैसे व्यक्ति को अवश्य ही प्रतिदिन नियमपूर्वक सूर्य को जल अर्पण करना चाहिए।

निम्न वैदिक मन्त्र से प्रतिदिन प्रातः एवं सायं संध्या में सूर्य देवता को अर्ध्य देने उपरान्त अन्जुलिबद्ध होकर प्रार्थना की जाती है -

तच्चक्षुर्देवहितं पुरस्ताच्छुक्रमुच्चरत् |
पश्येम शरदः शतं जीवम शरदः शतग्वँशृणुयाम
शरदः शतं प्र ब्रवाम् शरदः शतमदीनाः स्याम
शरदः शतं भूयश्च शरदः शतात् || यजु. ३६.२४||

पदार्थ :- हे परमेश्वर ! आप जो (देवहितम्) विद्वानों के लिये हितकारी( शुक्रम्) शुद्ध ( चक्षुः) नेत्र के तुल्य सबको दिखाने वाले ( पुरस्तात्) पूर्वकाल अर्थात् अनादि काल से ( उत् , चरत् ) उत्कृष्टता के साथ सबके ज्ञाता हैं ( तत् ) उस चेतन ब्रह्म आपको ( शतम् , शरदः) सौ वर्ष तक ( पश्येम ) देखें ( शतम् , शरदः ) सौ वर्ष तक ( जीवेम्) प्राणोंको धारण करें जीवें ( शतम् , शरदः ) सौ वर्ष पर्यन्त ( शृणुयाम्) शास्त्रों वा मङ्गल वचनों को सुनें ( शतम्, शरदः ) सौ वर्ष पर्यन्त ( प्रब्रवाम्) पढ़ावें वा उपदेश करें ( शतम् , शरदः ) सौ वर्ष पर्यन्त ( अदीनाः) दीनता रहित ( स्याम्) हों ( च ) और ( शतात् , शरदः ) सौ वर्ष से ( भूयः )अधिक भी देखें जीवें सुनें पढ़ें उपदेश करें और अदीन रहें |
भावार्थ :- हे परमेश्वर ! आप की कृपा आउर आपके विज्ञान से आपकी रचना को देखते हुए आप के साथ युक्त नीरोग और सावधान हुए हम लोग समस्तैन्द्रियों से युक्त सौ वर्ष से अधिक जेवें सत्य शास्त्रों और आप के गुणों को सुनें वेदादि को पढ़ावें सत्य का उपदेश करें कभी किसी वस्तु के विना पराधीन न अहों सदैव स्वतन्त्र हुए निरन्तर आनन्द भोगें और दूसरों को आनन्दित करें |
Sun Upasana – सूर्य अर्घ्य देने की विधि
*सूर्योदय के प्रथम किरण में अर्घ्य देना सबसे उत्तम माना गया है।
*सर्वप्रथम प्रात:काल सूर्योदय से पूर्व नित्य-क्रिया से निवृत्त्य होकर स्नान करें।
*उसके बाद उगते हुए सूर्य के सामने आसन लगाए।
*पुनः आसन पर खड़े होकर तांबे के पात्र में पवित्र जल लें।
*रक्तचंदन आदि से युक्त लाल पुष्प, चावल आदि तांबे के पात्र में रखे जल या हाथ की अंजुलि से तीन बार जल में ही मंत्र पढ़ते हुए जल अर्पण करना चाहिए।
*जैसे ही पूर्व दिशा में सूर्योदय दिखाई दे आप दोनों हाथों से तांबे के पात्र को पकड़कर इस तरह जल अर्पण करे की सूर्य तथा सूर्य की किरण जल की धार से दिखाई दें।
*ध्यान रखें जल अर्पण करते समय जो जल सूर्यदेव को अर्पण कर रहें है वह जल पैरों को स्पर्श न करे।
*सम्भव हो तो आप एक पात्र रख लीजिये ताकि जो जल आप अर्पण कर रहे है उसका स्पर्श आपके पैर से न हो पात्र में जमा जल को पुनः किसी पौधे में डाल दे।
*यदि सूर्य भगवान दिखाई नहीं दे रहे है तो कोई बात नहीं आप प्रतीक रूप में पूर्वाभिमुख होकर किसी ऐसे स्थान पर ही जल दे जो स्थान शुद्ध और पवित्र हो।
*जो रास्ता आने जाने का हो भूलकर भी वैसे स्थान पर अर्घ्य (जल अर्पण) नहीं करना चाहिए।
*पुनः उसके बाद दोनों हाथो से जल और भूमि को स्पर्श करे और ललाट, आँख कान तथा गला छुकर भगवान सूर्य देव को एकबार प्रणाम करें।

आने वाले पर्यावरण दिवस के पूर्व समाज को समर्पित | हम भारतीय प्रतिदिन पर्यावरण दिवस इस मन्त्र की दृष्टि में मनाते हैं | भारतीय पद्धतियों को अपनाएँ और सर्वदा सुखी रहें|

Tuesday, 30 May 2017

#Interesting#Facts#of#Lord- Shiva#भगवान शिव, शंकर, महादेव, भोलेनाथ से जुड़े रोचक तथ्य,

।। भगवान शिव से जुड़े कुछ रोचक तथ्य।।

                     
 आइंस्टीन से पूर्व शिव ने ही कहा था कि 'कल्पना' ज्ञान से ज्यादा महत्वपूर्ण है। हम जैसी कल्पना और विचार करते हैं, वैसे ही हो जाते हैं। शिव ने इस आधार पर ध्यान की कई विधियों का विकास किया। भगवान शिव दुनिया के सभी धर्मों का मूल हैं। शिव के दर्शन और जीवन की कहानी दुनिया के हर धर्म और उनके ग्रंथों में अलग-अलग रूपों में विद्यमान है। आज से 15 से 20 हजार वर्ष पूर्व वराह काल की शुरुआत में जब देवी-देवताओं ने धरती पर कदम रखे थे, तब उस काल में धरती हिमयुग की चपेट में थी। इस दौरान भगवान शंकर ने धरती के केंद्र कैलाश को अपना निवास स्थान.बनाया। 
                         सर्वप्रथम शिव ने ही धरती पर जीवन के प्रचार-प्रसार का प्रयास किया इसलिए उन्हें आदि देव भी कहा जाता है। आदि का अर्थ प्रारंभ। शिव को 'आदिनाथ' भी कहा जाता है। आदिनाथ होने के कारण उनका एक नाम आदिश भी है।इस 'आदिश' शब्द से ही 'आदेश' शब्द बना है। नाथ साधु जब एक--दूसरे से मिलते हैं तो कहते हैं- आदेश।
                           शिव संस्कृत भाषा का शब्द है, जिसका अर्थ है,कल्याणकारी या शुभकारी। यजुर्वेद में शिव को शांतिदाता बताया गया है। ‘शि’ का अर्थ है,पापों का नाश करने वाला, जबकि ‘व’ का अर्थ देने वाला यानी दाता।

क्या है शिवलिंग भगवान शिव के 12 ज्योतिर्लिंग ?
शिव की दो काया है। एक वह, जो स्थूल रूप से व्यक्त किया जाए, दूसरी वह, जो सूक्ष्म रूपी अव्यक्त लिंग के रूप में जानी जाती है। शिव की सबसे ज्यादा पूजा लिंग रूपी पत्थर के रूप में ही की जाती है। लिंग शब्द को लेकर बहुत भ्रम होता है। संस्कृत में लिंग का अर्थ है चिह्न। इसी अर्थ में यह शिवलिंग के लिए इस्तेमाल होता है। शिवलिंग का अर्थ है : शिव यानी परमपुरुष का प्रकृति के साथ समन्वित-चिह्न।
शिव, शंकर, महादेव…?
शिव का नाम शंकर के साथ जोड़ा जाता है। लोग कहते हैं – शिव शंकर भोलेनाथ। इस तरह अनजाने ही कई
लोग शिव और शंकर को एक ही सत्ता के दो नाम बताते हैं। असल में, दोनों की प्रतिमाएं अलग-अलग आकृति की हैं। शंकर को हमेशा तपस्वी रूप में दिखाया जाता है। कई जगह तो शंकर को शिवलिंग का ध्यान करते हुए दिखाया गया है। शिव ने सृष्टि की स्थापना, पालना और विनाश के लिए क्रमश: ब्रह्मा, विष्णु और महेश (महेश भी शंकर का ही नाम है) नामक तीन सूक्ष्म देवताओं की रचना की है। इस तरह शिव ब्रह्मांड के रचयिता हुए और शंकर उनकी एक रचना। भगवान शिव को इसीलिए महादेव भी कहा जाता है। इसके अलावा शिव को 108 दूसरे नामों से भी जाना और पूजा जाता है।
           भगवान शिव जितने रहस्यमयी हैं, उनकी वेश-भूषा व उनसे जुड़े तथ्य उतने ही विचित्र हैं। शिव श्मशान में निवास करते हैं, गले में नाग धारण करते हैं, भांग व धतूरा ग्रहण करते हैं। आदि न जाने कितने रोचक तथ्य इनके साथ जुड़े हैं। आज हम आपको भगवान शिव से जुड़ी ऐसी ही रोचक बातें व इनमें छिपे लाइफ मैनेजमेंट के सूत्रों के बारे में बता रहे हैं, जो इस प्रकार हैं-
★ भगवान शिव का कोई माता-पिता नही है. उन्हें अनादि माना गया है. मतलब, जो हमेशा से था. जिसके जन्म की कोई तिथि नही.
★ कथक, भरतनाट्यम करते वक्त भगवान शिव की जो मूर्ति रखी जाती है उसे नटराज कहते है.
★ किसी भी देवी-देवता की टूटी हुई मूर्ति की पूजा नही होती. लेकिन शिवलिंग चाहे कितना भी टूट जाए फिर भी पूजा जाता है.
★ शंकर भगवान की एक बहन भी थी अमावरी. जिसे माता पार्वती की जिद्द पर खुद महादेव ने अपनी माया से बनाया था.
★ भगवान शिव और माता पार्वती का 1 ही पुत्र था. जिसका नाम था कार्तिकेय. गणेश भगवान तो मां पार्वती ने अपने उबटन (शरीर पर लगे लेप) से बनाए थे.
★ भगवान शिव ने गणेश जी का सिर इसलिए काटा था क्योकिं गणेश ने शिव को पार्वती से मिलने नही दिया था. उनकी मां पार्वती ने ऐसा करने के लिए बोला था.
★ भोले बाबा ने तांडव करने के बाद सनकादि के लिए चौदह बार डमरू बजाया था. जिससे माहेश्वर सूत्र यानि संस्कृत व्याकरण का आधार प्रकट हुआ था.
★ शंकर भगवान पर कभी भी केतकी का फुल नही चढ़ाया जाता. क्योंकि यह ब्रह्मा जी के झूठ का गवाह बना था.
★ शिवलिंग पर बेलपत्र तो लगभग सभी चढ़ाते है. लेकिन इसके लिए भी एक ख़ास सावधानी बरतनी पड़ती है कि बिना जल के बेलपत्र नही चढ़ाया जा सकता.
★ शंकर भगवान और शिवलिंग पर कभी भी शंख से जल नही चढ़ाया जाता. क्योकिं शिव जी ने शंखचूड़ को अपने त्रिशूल से भस्म कर दिया था. आपको बता दें, शंखचूड़ की हड्डियों से ही शंख बना था.
★ भगवान शिव के गले में जो सांप लिपटा रहता है उसका नाम है वासुकि. यह शेषनाग के बाद नागों का दूसरा राजा था. भगवान शिव ने खुश होकर इसे गले में डालने का वरदान दिया था. 
★जिस बाघ की खाल को भगवान शिव पहनते है उस बाघ को उन्होनें खुद अपने हाथों से मारा था.
★ चंद्रमा को भगवान शिव की जटाओं में रहने का वरदान मिला हुआ है.
★ नंदी, जो शंकर भगवान का वाहन और उसके सभी गणों में सबसे ऊपर भी है. वह असल में शिलाद ऋषि को वरदान में प्राप्त पुत्र था. जो बाद में कठोर तप के कारण नंदी बना था 
★ गंगा भगवान शिव के सिर से क्यों बहती है ? देवी गंगा को जब धरती पर उतारने की सोची तो एक समस्या आई कि इनके वेग से तो भारी विनाश हो जाएगा. तब शंकर भगवान को मनाया गया कि पहले गंगा को अपनी ज़टाओं में बाँध लें, फिर अलग-अलग दिशाओं से धीरें-धीरें उन्हें धरती पर उतारें.
★ शंकर भगवान का शरीर नीला इसलिए पड़ा क्योंकि उन्होने जहर पी लिया था. दरअसल, समुंद्र मंथन के समय 14 चीजें निकली थी. 13 चीजें तो असुरों और देवताओं ने आधी-आधी बाँट ली लेकिन हलाहल नाम का विष लेने को कोई तैयार नही था. ये विष बहुत ही घातक था इसकी एक बूँद भी धरती पर बड़ी तबाही मचा सकती थी. तब भगवान शिव ने इस विष को पीया था. यही से उनका नाम पड़ा नीलकंठ.
सभी देवताओं में भगवान शिव एक ऐसे देवता है जो अपने भक्तों की पूजा पाठ सेबहुत जल्दी प्रसन्न हो जाते है इसलिए इन्हें भोलेनाथ कहा जाता है और यही कारण था की असुर भी वरदान प्राप्त करने के लिए भगवान शिव की तपस्या किया करते थे और उनसे मनचाहा वरदान प्राप्त कर लेते थे।
शिव ने जिस धनुष को बनाया था उसकी टंकार से ही बादल फट जाते थे और पर्वत हिलने लगते थे। ऐसा लगता था मानो भूकंप आ गया हो। यह धनुष बहुत ही शक्तिशाली था। इसी के एक तीर से त्रिपुरासुर की तीनों नगरियों को ध्वस्त कर दिया गया था। इस धनुष का नाम पिनाक था।  
शंकरजी के चक्र का नाम भवरेंदु, विष्णुजी के चक्र का नाम कांता चक्र और देवी का चक्र मृत्यु मंजरी के नाम से जाना जाता था। सुदर्शन चक्र का नाम भगवान कृष्ण के नाम के साथ अभिन्न रूप से जुड़ा हुआ है।  
त्रिशूल:-यह बहुत ही अचूक और घातक अस्त्र था। त्रिशूल 3 प्रकार के कष्टों दैनिक, दैविक, भौतिक के विनाश का सूचक है। इसमें 3 तरह की शक्तियां हैं- सत, रज और तम। प्रोटॉन, न्यूट्रॉन और इलेक्ट्रॉन। इसके अलावा-पाशुपतास्त्र भी शिव का अस्त्र है।  
शिव का सेवक वासुकी  -नागों के प्रारंभ में 5 कुल थे। उनके नाम इस प्रकार हैं- शेषनाग (अनंत), वासुकी, तक्षक, पिंगला और कर्कोटक। ये शोध के विषय हैं कि ये लोग सर्प थे या मानव या आधे सर्प और आधे मानव? हालांकि इन सभी को देवताओं की श्रेणी में रखा गया है तो निश्‍चित ही ये मनुष्य नहीं होंगे।  
शिव पंचायत:-पंचायत का फैसला अंतिम माना जाता है। देवताओं और दैत्यों के झगड़े आदि के बीच जब कोई महत्वपूर्ण निर्णय लेना होता था तो शिव की पंचायत का फैसला अंतिम होता था। शिव की पंचायत में 5 देवता शामिल थे।  ये 5 देवता थे:- 1. सूर्य, 2. गणपति, 3. देवी, 4. रुद्र और 5. विष्णु ये शिव पंचायत कहलाते हैं।
  ★ भगवान शिव को संहार का देवता माना जाता है. इसलिए कहते है, तीसरी आँख बंद ही रहे प्रभु की...
हर हर महादेव ...

Sunday, 28 May 2017

*सुखमय वृद्धावस्था **

50 year



*50 वर्ष से अधिक उम्र वाले इस सन्देश को सावधानी पूर्वक पढ़ें*, क्योंकि यह उनके आने वाले जीवन के लिए अत्यन्त ही महत्व पूर्ण :

        *सुखमय वृद्धावस्था *

*1* 🏠 *अपने स्वयं के स्थायी स्थान पर रहें ताकि स्वतंत्र जीवन जीने का आनंद ले सकें!* 

*2*💵 *अपना बैंक बेलेंस और भौतिक संपत्ति अपने पास रखें! अति प्रेम में पड़कर किसी के नाम                  करने की ना सोचें।*

*3* *अपने बच्चों के इस वादे पर निर्भर ना रहें कि वो वृद्धावस्था में आपकी सेवा करेंगे, क्योंकि समय        बदलने के साथ उनकी प्राथमिकता भी बदल जाती है और कभी कभी चाहते हुए भी वे कुछ              नहीं कर पाते* 👬

*4*👥 *उन लोगों को अपने मित्र समूह में शामिल रखें जो आपके जीवन को प्रसन्न देखना चाहते हैं ,             यानी सच्चे हितैषी हों।* 🙏

*5* 🙌 *किसी के साथ अपनी तुलना ना करें और ना ही किसी से कोई उम्मीद रखें!*

*6* 👫 *अपनी संतानों के जीवन में दखल अन्दाजी ना करें, उन्हें अपने तरीके से अपना जीवन जीने              दें और आप अपने तरीके से अपना जीवन जीएँ!*

*7* 👳 *अपनी वृद्धावस्था को आधार बनाकर किसी से सेवा करवाने, सम्मान पाने का प्रयास कभी              ना करें।*

*8* 🖐 *लोगों की बातें सुनें लेकिन अपने स्वतंत्र विचारों के आधार पर निर्णय लें।*

*9*👏 *प्रार्थना करें लेकिन भीख ना मांगे, यहाँ तक कि भगवान से भी नहीं। अगर भगवान से कुछ               मांगे तो सिर्फ माफ़ी और हिम्मत!* 

*10* 💪 *अपने स्वास्थ्य का स्वयं ध्यान रखें, चिकित्सीय परीक्षण के अलावा अपने आर्थिक सामर्थ्य                 अनुसार अच्छा पौष्टिक भोजन खाएं और यथा सम्भव अपना काम अपने हाथों से करें! छोटे               कष्टों पर ध्यान ना दें, उम्र के साथ छोटी मोटी शारीरिक परेशानीयां चलती रहती हैं।*

*11* 😎 *अपने जीवन को उल्लास से जीने का प्रयत्न करें खुद प्रसन्न रहने की चेष्टा करें और दूसरों                  को प्रसन्न रखें।*

*12* 💏 *प्रति वर्ष  अपने जीवन  साथी केे साथ भ्रमण/ छोटी यात्रा पर एक या अधिक बार अवश्य                 जाएं,  इससे आपका जीने का नजरिया बदलेगा!*

*13* 😖 *किसी भी टकराव को टालें एवं तनाव रहित जीवन जिऐं!* 
   
*14* 😫 *जीवन में स्थायी कुछ भी नहीं है चिंताएं भी नहीं इस बात का विश्वास करें !*

*15* 😃 *अपनी सामाजिक जिम्मेदारियों को रिटायरमेंट तक  पूरा कर लें, याद रखें जब तक आप                 अपने लिए जीना शुरू नहीं करते हैं तब तक आप जीवित नहीं हैं!*

😀 *खुशनुमा जीवन की शुभकामनाओं के साथ*                         🌹🌹🌹🌹🌹🌹

Wednesday, 24 May 2017

14 वर्ष के वनवास में राम कहां-कहां रहे?

14 वर्ष के वनवास में राम कहां-कहां रहे?


प्रभु श्रीराम को 14 वर्ष का वनवास हुआ। इस वनवास काल में श्रीराम ने कई ऋषि-मुनियों से शिक्षा और विद्या ग्रहण की, तपस्या की और भारत के आदिवासी, वनवासी और तमाम तरह के भारतीय समाज को संगठित कर उन्हें धर्म के मार्ग पर चलाया। संपूर्ण भारत को उन्होंने एक ही विचारधारा के सूत्र में बांधा, लेकिन इस दौरान उनके साथ कुछ ऐसा भी घटा जिसने उनके जीवन को बदल कर रख दिया।
रामायण में उल्लेखित और अनेक अनुसंधानकर्ताओं के अनुसार जब भगवान राम को वनवास हुआ तब उन्होंने अपनी यात्रा अयोध्या से प्रारंभ करते हुए रामेश्वरम और उसके बाद श्रीलंका में समाप्त की। इस दौरान उनके साथ जहां भी जो घटा उनमें से 200 से अधिक घटना स्थलों की पहचान की गई है।
जाने-माने इतिहासकार और पुरातत्वशास्त्री अनुसंधानकर्ता डॉ. राम अवतार ने श्रीराम और सीता के जीवन की घटनाओं से जुड़े ऐसे 200 से भी अधिक स्थानों का पता लगाया है, जहां आज भी तत्संबंधी स्मारक स्थल विद्यमान हैं, जहां श्रीराम और सीता रुके या रहे थे। वहां के स्मारकों, भित्तिचित्रों, गुफाओं आदि स्थानों के समय-काल की जांच-पड़ताल वैज्ञानिक तरीकों से की। आईये जानते हैं कुछ प्रमुख स्थानों के बारे में…
पहला पड़ाव…
1.केवट प्रसंग : राम को जब वनवास हुआ तो वाल्मीकि रामायण और शोधकर्ताओं के अनुसार वे सबसे पहले तमसा नदी पहुंचे, जो अयोध्या से 20 किमी दूर है। इसके बाद उन्होंने गोमती नदी पार की और प्रयागराज (इलाहाबाद) से 20-22 किलोमीटर दूर वे श्रृंगवेरपुर पहुंचे, जो निषादराज गुह का राज्य था। यहीं पर गंगा के तट पर उन्होंने केवट से गंगा पार करने को कहा था।
‘सिंगरौर’ : इलाहाबाद से 22 मील (लगभग 35.2 किमी) उत्तर-पश्चिम की ओर स्थित ‘सिंगरौर’ नामक स्थान ही प्राचीन समय में श्रृंगवेरपुर नाम से परिज्ञात था। रामायण में इस नगर का उल्लेख आता है। यह नगर गंगा घाटी के तट पर स्थित था। महाभारत में इसे ‘तीर्थस्थल’ कहा गया है।
‘कुरई’ : इलाहाबाद जिले में ही कुरई नामक एक स्थान है, जो सिंगरौर के निकट गंगा नदी के तट पर स्थित है। गंगा के उस पार सिंगरौर तो इस पार कुरई। सिंगरौर में गंगा पार करने के पश्चात श्रीराम इसी स्थान पर उतरे थे।
इस ग्राम में एक छोटा-सा मंदिर है, जो स्थानीय लोकश्रुति के अनुसार उसी स्थान पर है, जहां गंगा को पार करने के पश्चात राम, लक्ष्मण और सीताजी ने कुछ देर विश्राम किया था।
दूसरा पड़ाव…
2.चित्रकूट के घाट पर : कुरई से आगे चलकर श्रीराम अपने भाई लक्ष्मण और पत्नी सहित प्रयाग पहुंचे थे। प्रयाग को वर्तमान में इलाहाबाद कहा जाता है। यहां गंगा-जमुना का संगम स्थल है। हिन्दुओं का यह सबसे बड़ा तीर्थस्थान है। प्रभु श्रीराम ने संगम के समीप यमुना नदी को पार किया और फिर पहुंच गए चित्रकूट। यहां स्थित स्मारकों में शामिल हैं, वाल्मीकि आश्रम, मांडव्य आश्रम, भरतकूप इत्यादि।
चित्रकूट वह स्थान है, जहां राम को मनाने के लिए भरत अपनी सेना के साथ पहुंचते हैं। तब जब दशरथ का देहांत हो जाता है। भारत यहां से राम की चरण पादुका ले जाकर उनकी चरण पादुका रखकर राज्य करते हैं।
तीसरा पड़ाव…
3.अत्रि ऋषि का आश्रम : चित्रकूट के पास ही सतना (मध्यप्रदेश) स्थित अत्रि ऋषि का आश्रम था। महर्षि अत्रि चित्रकूट के तपोवन में रहा करते थे। वहां श्रीराम ने कुछ वक्त बिताया। अत्रि ऋषि ऋग्वेद के पंचम मंडल के द्रष्टा हैं। अत्रि ऋषि की पत्नी का नाम है अनुसूइया, जो दक्ष प्रजापति की चौबीस कन्याओं में से एक थी।
अत्रि पत्नी अनुसूइया के तपोबल से ही भगीरथी गंगा की एक पवित्र धारा चित्रकूट में प्रविष्ट हुई और ‘मंदाकिनी’ नाम से प्रसिद्ध हुई। ब्रह्मा, विष्णु व महेश ने अनसूइया के सतीत्व की परीक्षा ली थी, लेकिन तीनों को उन्होंने अपने तपोबल से बालक बना दिया था। तब तीनों देवियों की प्रार्थना के बाद ही तीनों देवता बाल रूप से मुक्त हो पाए थे। फिर तीनों देवताओं के वरदान से उन्हें एक पुत्र मिला, जो थे महायोगी ‘दत्तात्रेय’।
अत्रि ऋषि के दूसरे पुत्र का नाम था ‘दुर्वासा’। दुर्वासा ऋषि को कौन नहीं जानता?
Durvasa and Sakunlata
अत्रि के आश्रम के आस-पास राक्षसों का समूह रहता था। अत्रि, उनके भक्तगण व माता अनुसूइया उन राक्षसों से भयभीत रहते थे। भगवान श्रीराम ने उन राक्षसों का वध किया। वाल्मीकि रामायण के अयोध्या कांड में इसका वर्णन मिलता है।
प्रातःकाल जब राम आश्रम से विदा होने लगे तो अत्रि ऋषि उन्हें विदा करते हुए बोले, ‘हे राघव! इन वनों में भयंकर राक्षस तथा सर्प निवास करते हैं, जो मनुष्यों को नाना प्रकार के कष्ट देते हैं। इनके कारण अनेक तपस्वियों को असमय ही काल का ग्रास बनना पड़ा है। मैं चाहता हूं, तुम इनका विनाश करके तपस्वियों की रक्षा करो।’
राम ने महर्षि की आज्ञा को शिरोधार्य कर उपद्रवी राक्षसों तथा मनुष्य का प्राणांत करने वाले भयानक सर्पों को नष्ट करने का वचन देकर सीता तथा लक्ष्मण के साथ आगे के लिए प्रस्थान किया।
चित्रकूट की मंदाकिनी, गुप्त गोदावरी, छोटी पहाड़ियां, कंदराओं आदि से निकलकर भगवान राम पहुंच गए घने जंगलों में…
चौथा पड़ाव,
4. दंडकारण्य : अत्रि ऋषि के आश्रम में कुछ दिन रुकने के बाद श्रीराम ने मध्यप्रदेश और छत्तीसगढ़ के घने जंगलों को अपना आश्रय स्थल बनाया। यह जंगल क्षेत्र था दंडकारण्य। ‘अत्रि-आश्रम’ से ‘दंडकारण्य’ आरंभ हो जाता है। छत्तीसगढ़ के कुछ हिस्सों पर राम के नाना और कुछ पर बाणासुर का राज्य था। यहां के नदियों, पहाड़ों, सरोवरों एवं गुफाओं में राम के रहने के सबूतों की भरमार है। यहीं पर राम ने अपना वनवास काटा था। यहां वे लगभग 10 वर्षों से भी अधिक समय तक रहे थे।
‘अत्रि-आश्रम’ से भगवान राम मध्यप्रदेश के सतना पहुंचे, जहां ‘रामवन’ हैं। मध्यप्रदेश एवं छत्तीसगढ़ क्षेत्रों में नर्मदा व महानदी नदियों के किनारे 10 वर्षों तक उन्होंने कई ऋषि आश्रमों का भ्रमण किया। दंडकारण्य क्षेत्र तथा सतना के आगे वे विराध सरभंग एवं सुतीक्ष्ण मुनि आश्रमों में गए। बाद में सतीक्ष्ण आश्रम वापस आए। पन्ना, रायपुर, बस्तर और जगदलपुर में कई स्मारक विद्यमान हैं। उदाहरणत: मांडव्य आश्रम, श्रृंगी आश्रम, राम-लक्ष्मण मंदिर आदि।
राम वहां से आधुनिक जबलपुर, शहडोल (अमरकंटक) गए होंगे। शहडोल से पूर्वोत्तर की ओर सरगुजा क्षेत्र है। यहां एक पर्वत का नाम ‘रामगढ़’ है। 30 फीट की ऊंचाई से एक झरना जिस कुंड में गिरता है, उसे ‘सीता कुंड’ कहा जाता है। यहां वशिष्ठ गुफा है। दो गुफाओं के नाम ‘लक्ष्मण बोंगरा’ और ‘सीता बोंगरा’ हैं। शहडोल से दक्षिण-पूर्व की ओर बिलासपुर के आसपास छत्तीसगढ़ है।
वर्तमान में करीब 92,300 वर्ग किलोमीटर क्षेत्रफल में फैले इस इलाके के पश्चिम में अबूझमाड़ पहाड़ियां तथा पूर्व में इसकी सीमा पर पूर्वी घाट शामिल हैं। दंडकारण्य में छत्तीसगढ़, ओडिशा एवं आंध्रप्रदेश राज्यों के हिस्से शामिल हैं। इसका विस्तार उत्तर से दक्षिण तक करीब 320 किमी तथा पूर्व से पश्चिम तक लगभग 480 किलोमीटर है।
दंडक राक्षस के कारण इसका नाम दंडकारण्य पड़ा। यहां रामायण काल में रावण के सहयोगी बाणासुर का राज्य था। उसका इन्द्रावती, महानदी और पूर्व समुद्र तट, गोइंदारी (गोदावरी) तट तक तथा अलीपुर, पारंदुली, किरंदुली, राजमहेन्द्री, कोयापुर, कोयानार, छिन्दक कोया तक राज्य था। वर्तमान बस्तर की ‘बारसूर’ नामक समृद्ध नगर की नींव बाणासुर ने डाली, जो इन्द्रावती नदी के तट पर था। यहीं पर उसने ग्राम देवी कोयतर मां की बेटी माता माय (खेरमाय) की स्थापना की। बाणासुर द्वारा स्थापित देवी दांत तोना (दंतेवाड़िन) है। यह क्षेत्र आजकल दंतेवाड़ा के नाम से जाना जाता है। यहां वर्तमान में गोंड जाति निवास करती है तथा समूचा दंडकारण्य अब नक्सलवाद की चपेट में है।
इसी दंडकारण्य का ही हिस्सा है आंध्रप्रदेश का एक शहर भद्राचलम। गोदावरी नदी के तट पर बसा यह शहर सीता-रामचंद्र मंदिर के लिए प्रसिद्ध है। यह मंदिर भद्रगिरि पर्वत पर है। कहा जाता है कि श्रीराम ने अपने वनवास के दौरान कुछ दिन इस भद्रगिरि पर्वत पर ही बिताए थे।
स्थानीय मान्यता के मुताबिक दंडकारण्य के आकाश में ही रावण और जटायु का युद्ध हुआ था और जटायु के कुछ अंग दंडकारण्य में आ गिरे थे। ऐसा माना जाता है कि दुनियाभर में सिर्फ यहीं पर जटायु का एकमात्र मंदिर है।
दंडकारण्य क्षे‍त्र की चर्चा पुराणों में विस्तार से मिलती है। इस क्षेत्र की उत्पत्ति कथा महर्षि अगस्त्य मुनि से जुड़ी हुई है। यहीं पर उनका महाराष्ट्र के नासिक के अलावा एक आश्रम था।
डॉ. रमानाथ त्रिपाठी ने अपने बहुचर्चित उपन्यास ‘रामगाथा’ में रामायणकालीन दंडकारण्य का विस्तृत उल्लेख किया है।
पांचवां पड़ाव…
‘पंचानां वटानां समाहार इति पंचवटी’।
5. पंचवटी में राम : दण्डकारण्य में मुनियों के आश्रमों में रहने के बाद श्रीराम कई नदियों, तालाबों, पर्वतों और वनों को पार करने के पश्चात नासिक में अगस्त्य मुनि के आश्रम गए। मुनि का आश्रम नासिक के पंचवटी क्षेत्र में था। त्रेतायुग में लक्ष्मण व सीता सहित श्रीरामजी ने वनवास का कुछ समय यहां बिताया।
उस काल में पंचवटी जनस्थान या दंडक वन के अंतर्गत आता था। पंचवटी या नासिक से गोदावरी का उद्गम स्थान त्र्यंम्बकेश्वर लगभग 20 मील (लगभग 32 किमी) दूर है। वर्तमान में पंचवटी भारत के महाराष्ट्र के नासिक में गोदावरी नदी के किनारे स्थित विख्यात धार्मिक तीर्थस्थान है।
अगस्त्य मुनि ने श्रीराम को अग्निशाला में बनाए गए शस्त्र भेंट किए। नासिक में श्रीराम पंचवटी में रहे और गोदावरी के तट पर स्नान-ध्यान किया। नासिक में गोदावरी के तट पर पांच वृक्षों का स्थान पंचवटी कहा जाता है।
ये पांच वृक्ष थे पीपल, बरगद, आंवला, बेल तथा अशोक वट। यहीं पर सीता माता की गुफा के पास पांच प्राचीन वृक्ष हैं जिन्हें पंचवट के नाम से जाना जाता है। माना जाता है कि इन वृक्षों को राम-सीमा और लक्ष्मण ने अपने हाथों से लगाया था।
यहीं पर लक्ष्मण ने शूर्पणखा की नाक काटी थी। राम-लक्ष्मण ने खर व दूषण के साथ युद्ध किया था। यहां पर मारीच वध स्थल का स्मारक भी अस्तित्व में है। नासिक क्षेत्र स्मारकों से भरा पड़ा है, जैसे कि सीता सरोवर, राम कुंड, त्र्यम्बकेश्वर आदि। यहां श्रीराम का बनाया हुआ एक मंदिर खंडहर रूप में विद्यमान है।
मरीच का वध पंचवटी के निकट ही मृगव्याधेश्वर में हुआ था। गिद्धराज जटायु से श्रीराम की मैत्री भी यहीं हुई थी। वाल्मीकि रामायण, अरण्यकांड में पंचवटी का मनोहर वर्णन मिलता है।
छठा पड़ाव..                                            सर्वतीर्थ घोटी ताकेद नासिक
6.सीताहरण का स्थान ‘सर्वतीर्थ’ : नासिक क्षेत्र में शूर्पणखा, मारीच और खर व दूषण के वध के बाद ही रावण ने सीता का हरण किया और जटायु का भी वध किया जिसकी स्मृति नासिक से 56 किमी दूर ताकेड गांव में ‘सर्वतीर्थ’ नामक स्थान पर आज भी संरक्षित है।
जटायु की मृत्यु सर्वतीर्थ नाम के स्थान पर हुई, जो नासिक जिले के इगतपुरी तहसील के ताकेड गांव में मौजूद है। इस स्थान को सर्वतीर्थ इसलिए कहा गया, क्योंकि यहीं पर मरणासन्न जटायु ने सीता माता के बारे में बताया। रामजी ने यहां जटायु का अंतिम संस्कार करके पिता और जटायु का श्राद्ध-तर्पण किया था। इसी तीर्थ पर लक्ष्मण रेखा थी।
पर्णशाला : पर्णशाला आंध्रप्रदेश में खम्माम जिले के भद्राचलम में स्थित है। रामालय से लगभग 1 घंटे की दूरी पर स्थित पर्णशाला को ‘पनशाला’ या ‘पनसाला’ भी कहते हैं। हिन्दुओं के प्रमुख धार्मिक स्थलों में से यह एक है। पर्णशाला गोदावरी नदी के तट पर स्थित है। मान्यता है कि यही वह स्थान है, जहां से सीताजी का हरण हुआ था। हालांकि कुछ मानते हैं कि इस स्थान पर रावण ने अपना विमान उतारा था।
इस स्थल से ही रावण ने सीता को पुष्पक विमान में बिठाया था यानी सीताजी ने धरती यहां छोड़ी थी। इसी से वास्तविक हरण का स्थल यह माना जाता है। यहां पर राम-सीता का प्राचीन मंदिर है।
सातवां पड़ाव....
7.सीता की खोज : सर्वतीर्थ जहां जटायु का वध हुआ था, वह स्थान सीता की खोज का प्रथम स्थान था। उसके बाद श्रीराम-लक्ष्मण तुंगभद्रा तथा कावेरी नदियों के क्षेत्र में पहुंच गए। तुंगभद्रा एवं कावेरी नदी क्षेत्रों के अनेक स्थलों पर वे सीता की खोज में गए।
आठवां पड़ाव…
8.शबरी का आश्रम : तुंगभद्रा और कावेरी नदी को पार करते हुए राम और लक्ष्‍मण चले सीता की खोज में। जटायु और कबंध से मिलने के पश्‍चात वे ऋष्यमूक पर्वत पहुंचे। रास्ते में वे पम्पा नदी के पास शबरी आश्रम भी गए, जो आजकल केरल में स्थित है।
शबरी जाति से भीलनी थीं और उनका नाम था श्रमणा।
पम्पा नदी भारत के केरल राज्य की तीसरी सबसे बड़ी नदी है। इसे ‘पम्बा’ नाम से भी जाना जाता है। ‘पम्पा’ तुंगभद्रा नदी का पुराना नाम है। श्रावणकौर रजवाड़े की सबसे लंबी नदी है। इसी नदी के किनारे पर हम्पी बसा हुआ है। यह स्थान बेर के वृक्षों के लिए आज भी प्रसिद्ध है। पौराणिक ग्रंथ ‘रामायण’ में भी हम्पी का उल्लेख वानर राज्य किष्किंधा की राजधानी के तौर पर किया गया है।
केरल का प्रसिद्ध ‘सबरिमलय मंदिर’ तीर्थ इसी नदी के तट पर स्थित है।
सबरिमलय मंदिर’ तीर्थ इसी नदी के तट पर स्थित है।
नौवां पड़ाव…
kishkinda near hampi, Anjaneya Parvat
,Lord Hanuman, Vanara King Sugriva
 place
9.हनुमान से भेंट : मलय पर्वत और चंदन वनों को पार करते हुए वे ऋष्यमूक पर्वत की ओर बढ़े। यहां उन्होंने हनुमान और सुग्रीव से भेंट की, सीता के आभूषणों को देखा और श्रीराम ने बाली का वध किया।
ऋष्यमूक पर्वत वाल्मीकि रामायण में वर्णित वानरों की राजधानी किष्किंधा के निकट स्थित था। इसी पर्वत पर श्रीराम की हनुमान से भेंट हुई थी। बाद में हनुमान ने राम और सुग्रीव की भेंट करवाई, जो एक अटूट मित्रता बन गई। जब महाबली बाली अपने भाई सुग्रीव को मारकर किष्किंधा से भागा तो वह ऋष्यमूक पर्वत पर ही आकर छिपकर रहने लगा था।
ऋष्यमूक पर्वत तथा किष्किंधा नगर कर्नाटक के हम्पी, जिला बेल्लारी में स्थित है। विरुपाक्ष मंदिर के पास से ऋष्यमूक पर्वत तक के लिए मार्ग जाता है। यहां तुंगभद्रा नदी (पम्पा) धनुष के आकार में बहती है। तुंगभद्रा नदी में पौराणिक चक्रतीर्थ माना गया है। पास ही पहाड़ी के नीचे श्रीराम मंदिर है। पास की पहाड़ी को ‘मतंग पर्वत’ माना जाता है। इसी पर्वत पर मतंग ऋषि का आश्रम था।
दसवां पड़ाव..
10.कोडीकरई : हनुमान और सुग्रीव से मिलने के बाद श्रीराम ने अपनी सेना का गठन किया और लंका की ओर चल पड़े। मलय पर्वत, चंदन वन, अनेक नदियों, झरनों तथा वन-वाटिकाओं को पार करके राम और उनकी सेना ने समुद्र की ओर प्रस्थान किया। श्रीराम ने पहले अपनी सेना को कोडीकरई में एकत्रित किया।
तमिलनाडु की एक लंबी तटरेखा है, जो लगभग 1,000 किमी तक विस्‍तारित है। कोडीकरई समुद्र तट वेलांकनी के दक्षिण में स्थित है, जो पूर्व में बंगाल की खाड़ी और दक्षिण में पाल्‍क स्‍ट्रेट से घिरा हुआ है।
लेकिन राम की सेना ने उस स्थान के सर्वेक्षण के बाद जाना कि यहां से समुद्र को पार नहीं किया जा सकता और यह स्थान पुल बनाने के लिए उचित भी नहीं है, तब श्रीराम की सेना ने रामेश्वरम की ओर कूच किया।
ग्यारहवां पड़ाव…
11.रामेश्‍वरम : रामेश्‍वरम समुद्र तट एक शांत समुद्र तट है और यहां का छिछला पानी तैरने और सन बेदिंग के लिए आदर्श है। रामेश्‍वरम प्रसिद्ध हिन्दू तीर्थ केंद्र है। महाकाव्‍य रामायण के अनुसार भगवान श्रीराम ने लंका पर चढ़ाई करने के पहले यहां भगवान शिव की पूजा की थी। रामेश्वरम का शिवलिंग श्रीराम द्वारा स्थापित शिवलिंग है।
बारहवां पड़ाव…
12.धनुषकोडी : वाल्मीकि के अनुसार तीन दिन की खोजबीन के बाद श्रीराम ने रामेश्वरम के आगे समुद्र में वह स्थान ढूंढ़ निकाला, जहां से आसानी से श्रीलंका पहुंचा जा सकता हो। उन्होंने नल और नील की मदद से उक्त स्थान से लंका तक का पुनर्निर्माण करने का फैसला लिया।
छेदुकराई तथा रामेश्वरम के इर्द-गिर्द इस घटना से संबंधित अनेक स्मृतिचिह्न अभी भी मौजूद हैं। नाविक रामेश्वरम में धनुषकोडी नामक स्थान से यात्रियों को रामसेतु के अवशेषों को दिखाने ले जाते हैं।
धनुषकोडी भारत के तमिलनाडु राज्‍य के पूर्वी तट पर रामेश्वरम द्वीप के दक्षिणी किनारे पर स्थित एक गांव है। धनुषकोडी पंबन के दक्षिण-पूर्व में स्थित है। धनुषकोडी श्रीलंका में तलैमन्‍नार से करीब 18 मील पश्‍चिम में है।
इसका नाम धनुषकोडी इसलिए है कि यहां से श्रीलंका तक वानर सेना के माध्यम से नल और नील ने जो पुल (रामसेतु) बनाया था उसका आकार मार्ग धनुष के समान ही है। इन पूरे इलाकों को मन्नार समुद्री क्षेत्र के अंतर्गत माना जाता है। धनुषकोडी ही भारत और श्रीलंका के बीच एकमात्र स्‍थलीय सीमा है, जहां समुद्र नदी की गहराई जितना है जिसमें कहीं-कहीं भूमि नजर आती है।
दरअसल, यहां एक पुल डूबा पड़ा है। 1860 में इसकी स्पष्ट पहचान हुई और इसे हटाने के कई प्रयास किए गए। अंग्रेज इसे एडम ब्रिज कहने लगे तो स्थानीय लोगों में भी यह नाम प्रचलित हो गया। अंग्रेजों ने कभी इस पुल को क्षतिग्रस्त नहीं किया लेकिन आजाद भारत में पहले रेल ट्रैक निर्माण के चक्कर में बाद में बंदरगाह बनाने के चलते इस पुल को क्षतिग्रस्त किया गया।
30 मील लंबा और सवा मील चौड़ा यह रामसेतु 5 से 30 फुट तक पानी में डूबा है। श्रीलंका सरकार इस डूबे हुए पुल (पम्बन से मन्नार) के ऊपर भू-मार्ग का निर्माण कराना चाहती है जबकि भारत सरकार नौवहन हेतु उसे तोड़ना चाहती है। इस कार्य को भारत सरकार ने सेतुसमुद्रम प्रोजेक्ट का नाम दिया है। श्रीलंका के ऊर्जा मंत्री श्रीजयसूर्या ने इस डूबे हुए रामसेतु पर भारत और श्रीलंका के बीच भू-मार्ग का निर्माण कराने का प्रस्ताव रखा था।
तेरहवां पड़ाव…
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13.’नुवारा एलिया’ पर्वत श्रृंखला : वाल्मीकिय-रामायण अनुसार श्रीलंका के मध्य में रावण का महल था। ‘नुवारा एलिया’ पहाड़ियों से लगभग 90 किलोमीटर दूर बांद्रवेला की तरफ मध्य लंका की ऊंची पहाड़ियों के बीचोबीच सुरंगों तथा गुफाओं के भंवरजाल मिलते हैं। यहां ऐसे कई पुरातात्विक अवशेष मिलते हैं जिनकी कार्बन डेटिंग से इनका काल निकाला गया है।
श्रीलंका में नुआरा एलिया पहाड़ियों के आसपास स्थित रावण फॉल, रावण गुफाएं, अशोक वाटिका, खंडहर हो चुके विभीषण के महल आदि की पुरातात्विक जांच से इनके रामायण काल के होने की पुष्टि होती है। आजकल भी इन स्थानों की भौगोलिक विशेषताएं, जीव, वनस्पति तथा स्मारक आदि बिल्कुल वैसे ही हैं जैसे कि रामायण में वर्णित किए गए हैं।
श्रीवाल्मीकि ने रामायण की संरचना श्रीराम के राज्याभिषेक के बाद वर्ष 5075 ईपू के आसपास की होगी (1/4/1 2)। श्रुति स्मृति की प्रथा के माध्यम से पीढ़ी-दर-पीढ़ी परिचलित रहने के बाद वर्ष 1000 ईपू के आसपास इसको लिखित रूप दिया गया होगा। इस निष्कर्ष के बहुत से प्रमाण मिलते हैं। रामायण की कहानी के संदर्भ निम्नलिखित रूप में उपलब्ध हैं
* कौटिल्य का अर्थशास्त्र (चौथी शताब्दी ईपू)
* बौ‍द्ध साहित्य में दशरथ जातक (तीसरी शताब्दी ईपू)
* कौशाम्बी में खुदाई में मिलीं टेराकोटा (पक्की मिट्‍टी) की मूर्तियां (दूसरी शताब्दी ईपू)
* नागार्जुनकोंडा (आंध्रप्रदेश) में खुदाई में मिले स्टोन पैनल (तीसरी शताब्दी)
* नचार खेड़ा (हरियाणा) में मिले टेराकोटा पैनल (चौथी शताब्दी)
* श्रीलंका के प्रसिद्ध कवि कुमार दास की काव्य रचना ‘जानकी हरण’ (सातवीं शताब्दी)