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Monday, 14 August 2017

#A School where every child wrights with both hands It Happens Only in India

 
Student Ankit and Vinod Sehgal
यह वाकया दिनांक 6 अगस्त 2017 का है। मै शासकीय  कार्य से बैढन के आस पास की प्रधान मंत्री ग्रामीण सड़क योजना में निर्मित सड़कों का इंस्पेक्शन कर रहे थे एवं इंस्पेक्शन के अंत में हम लोग बुधेला ग्राम के पास पहुँच गए। हमारे साथ MPRRDA के श्री एस पी सिंह एवं श्री खान ABM थे। इंस्पेक्शन पूर्ण होने पर श्री सिंह साहब ने कहा कि चलिए साहब हम आपको एक अजूबा दिखाते है। यहाँ पास में एक बुधेला ग्राम है वहाँ पर वीणा वादनी पब्लिक स्कूल है। जिसमें स्कूल के सभी छात्र दोनों हाथों से एक साथ लिखते है। यह एक अजूबा है मैने भी इसके बारे में सुना है आज जब हम लोग इतने पास आ गए है तो अच्छा है कि हम इस आश्चर्य को देखें और हम लोग ग्राम बुधेला पहुंचे। आज का दिन इतवार था इसलिए स्कूल की छुट्टी थी। लेकिन हमारी किस्मत अच्छी  थी क्योंकि वहाँ रहने वाले कुछ छात्र थे। हम लोगों ने छात्रों से निवेदन किया कि सयोंग से हमको यहां आने का मौका मिला है और बगैर इस प्रतिभा को देखे जाने का अफ़सोस होगा। हमारे बार बार निवेदन करने पर कुछ छात्रों ने मोबाइल पर अपने प्राचार्य से अनुमति ली एवं अद्भुद प्रतिभा देखने मिली।
हम उसी से परचित कराने जा रहे है। जिसकी कल्पना भी शायद आपने की होगी। यह वास्तव में अदभुत एवं अकल्पनीय है। यह बात हो रही है देश की ऊर्जा राजधानी सिंगरौली म.प्र. के छोटे से गांव बुधेला के वीणा वादनी पब्लिक स्कूल की। 
  



 







कंप्यूटर से भी तेज स्पीड 
वर्तमान में स्कूल में अध्ययनरत  करीब 230 छात्र से एक साथ दोनों हाथों से लिखने की कला में पारंगत हो गए है। किसी अच्छे कंप्यूटर आपरेटर से भी तेज रफ़्तार में उनकी कलम चलती है। 
दो भाषाओ में एक साथ लेखन 
दिमाग और नजरों से इतने मजबूत है कि दोनों हाथ से हिंदी -अंग्रेजी ,उर्दू -रोमन ,रोमन में गिनती -हिंदी में गिनती अर्थात दो भाषाओं में लिख कर हैरत में डाल देते है। 
बच्चों को 7 भाषाओं का ज्ञान 
स्कूल में क्लास 1 से 8 तक की पढ़ाई होती है। नन्हें हाथ देवनागरी लिपि ,उर्दू ,स्पेनिश, रोमन ,अंग्रेजी ,अरबी एवं हिंदी में लिखते है। दोनों हाथों से लिखने का कम्पटीशन होता है। जिसमे बच्चे 11 घण्टे में 24000 शब्द लिखने की छमता रखते है। 
250 शब्दों का अनुवाद
45 सेकंड में उर्दू में गिनती ,1 मिनिट में संस्कृत में पहाड़ा , 1 मिनिट में दो भाषाओ के 250 शब्दों का अनुवाद कर देते है। स्कूल के आस पास से पोंडी ,बुधेला ,पिपरा ,नौगई , डिंगही ,बिहरा ,राजा सरई  आदि ग्राम के बच्चे यह कला सीख रहे है। 
इस कला को क्या कहते है। 
इस कला को उभयहस्त कौशल Ambidextrous skill कहते है। 

सव्यसाची कौशल ,बायें और दाहिने दोनों उपांगो ,जैसे दोनों हाथ से काम करने में समान रूप से निपुण होने की स्थिति को उभय उपांग  कौशल या उभयहस्त कौशल या सव्यसाची कौशल  कहते है। मिश्रित प्रभुत्व की यह एक सबसे मशहूर कौशलों में से एक है। प्राकृतिक रूप से उभयहस्त कौशल या  सव्यसाची लोग दुर्लभ हुआ करते है। सौ में से एक व्यक्ति सव्यसाची कौशल हुआ करता है। आधुनिक समय में उभयहस्त कौशल या  सव्यसाची माने जाने वाले व्यक्तियों का पाया जाना अधिक आम बात हो गयी है। जो लोग मूलतः बायें हाथ वाले होते है या जो जानकर उभयहस्त कौशल या  सव्यसाची बनते है उन्हें बचपन से स्कूल अथवा सस्थानों में सीखना पड़ता है। जहाँ दोनों हाथ से कार्य करने पर जोर दिया जाता है।
              बाजीगर ,तैराकी ,तालवाद्य कीबोर्ड संगीत ,बेसबाल ,सर्जरी ,मुक्केबाजी ,मार्शल आर्ट्स और बास्केटबाल जैसी गतिविधियों के लिए दोनों हाथों की निपुणता  के कारण उभयहस्तकौशलता को अक्सर प्रोत्साहित किया जाता है। 



अन्य खेलों में उभयहस्तकौशल का महत्व 
भिड़ंत वाले खेलों में अपने विरोधी का सामना करने के लिए या तो दाहिने हाथ की मुद्रा -ऑर्थोडॉक्स -में वायें कंधे को आगे करते है  या फिर बायें हाथ की मुद्रा -साउथ पौ -में दाहिने कंधे को आगे करते है  इसका उल्टा प्रभाव उपयोगी होता है। 
फुटबाल में दोनों पैरों से किक मारने में सछम होने से पास करने और गोल मारने के अधिक मौके प्राप्त होते है साथ ही दोनों पैरों के महत्त्व की छमता बढ़ती है। इसलिए जिन खिलाड़ियों में दछता के साथ साथ कमजोर पैर के उपयोग की छमता होती है वे टीम के लिए बेशकीमती होते है। 
बेसबॉल ,फुटबॉल और बास्केटबाल क्र खेलों में उभयहस्तकौशल की बड़ी क़द्र है। 
-स्विच हिटिंग - बहुत ही आम घटना है और इसकी बड़ी क़द्र है क्योकि किसी बल्लेबाज के पास आमतोर पर बेसबॉल को सफलतापूर्वक हिट करने के लिए बहुत अधिक सांख्यिकीय मौका होता है। जब उसे किसी विपरीत हाथ वाले पिचिर दवारा फेंका जाता है। इसलिए उभयहस्तकौशल वयक्ति किसी ओर से बल्लेबाजी कर सकता है जो उस स्थिति में उसके लिए बहुत लाभदायक है। 
सचिन तेंदुलकर लिखने और खाने के लिए बाएं हाथ का उपयोग करते है लेकिन बल्लेबाजी और गेंद बाजी दाये हाथ से करते है। इसके विपरीत उदहारण भी है क्रिकेट में भी दोनों हाथों से सछम होना फायदेमंद है। सव्यसाची फील्डर एक हाथ से कैच ले सकते है या किसी भी हाथ से गेंद फेकसकते हैं। 




अपने गैर प्रमुख हाथ से लिखना संभव है -
अभ्यास और संकल्प से ज्यादा कुछ नहीं। शुरुआत में आपका हाथ तनाव महसूस करता है लेकिन ब्रेक ले ले कर प्रयास करने से सीखना आसान हो जाता है। अगर आप रोजाना अभ्यास करते है तो आपका कमजोर हाथ 2--3 महीनों में काफी अच्छा लिखने लगेगा। उभयहस्तकौशलता एक प्रतिभा है जो कि व्यक्ति के साथ पैदा होती है। हालांकि यह एक ऐसा कौशल भी है जिसे आप सीख सकते है। 

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प्रथम राष्ट्रपति राजेंद्र प्रसाद से मिली प्रेरणा 
बुधेला ग्राम में  वीणा वादनी पब्लिक स्कूल की स्थापना 8 जुलाई 1999 को एक पूर्व सैनिक श्री वीरंगद शर्मा जी ने की थी। जो उस समय जबलपुर में आर्मी में ट्रेनिंग ले रहे थे। उनका कहना है कि एक बस में यात्रा के दौरान वह एक पत्रिका में पढ़ा कि प्रथम राष्ट्रपति राजेंद्र प्रसाद दोनों हाथों  लिखते थे। 
जिज्ञासा हुई ऐसा कैसे हो सकता है उन्होंने खुद काफी प्रयास किया लेकिन विफल रहे फिर बच्चों को सिखाने का प्रयास किया सफल हुए और इस प्रकार विद्यालय की नीव पड़ी। अब सभी बच्चों के दोनों हाथो से एक साथ लिखने की कला विशेषज्ञता बन गई।शुरुवात में विद्यालय खोलते समय अभिभावकों यह नहीं बताया था कि दोनों हाथों से लिखना सिखाऊंगा। बच्चों को धीरे धीरे लिखना सिखाया फिर बच्चों ने इधर उधर अपनी प्रतिभा दिखाई। आज स्कूल में 230 से अधिक बच्चे है। अधिकांश छात्र दलित और आदिवासी है। अब बच्चों के दोनों हाथों से लिखने की कला स्कूल का रूटीन हिस्सा है।   
अभावों में पलती प्रतिभा 
संसाधनों के हिसाब से भले ही ये स्कूल अति पिछड़ा हो पर यहाँ की प्रतिभा सब को मात दे रही है। यहीं के छात्र रहे आशुतोष शर्मा ने सिंगरौली के उत्कृष्ट उच्चतर माध्यमिक विद्यालय में नौवीं कछा में मैथ्स 100 में से 99 अंक अर्जित किये जो रिकार्ड है।  

Friday, 21 July 2017

#Do keep faith in the Creator always#

*THE PREGNANT DEER - such a beautiful story and a story difficult to come by!!*
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*In a forest, a pregnant deer is about to give birth. She finds a remote grass field near a strong-flowing river*. 
*This seems a safe place*. 
*Suddenly labour pains begin.*
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*At the same moment, dark clouds gather around above and lightning starts a forest fire*. 
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*She looks to her left  and sees a hunter with his bow extended pointing at her. To her right, she spots a hungry lion approaching her*.
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*What can the pregnant deer do? Remember she is in labour!!*
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*What will happen?* 
*Will the deer survive?* 
*Will she give birth to a fawn?* 
*Will the fawn survive?* 
*Or will everything be burnt by the forest fire?* 
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Will she perish to the hunters' arrow? 
Will she die a horrible death at the hands of the hungry lion approaching her? 
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She is constrained by the fire on the one side and the flowing river on the other and boxed in by her natural predators.
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What does she do? 
She focuses on giving birth to a new life.
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 The sequence of events that follows are:
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 - lightning strikes and blinds the hunter.
 - he (the hunter) releases the arrow which zips past the deer and strikes the hungry lion.
 - it starts to rain heavily and the forest fire is slowly doused by the rain.
 - the deer gives birth to a healthy fawn.
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Check the circumstances that took place above and ask yourself whether the deer had any influence in the chain of reactions that happened to her enemies right in front of her very eyes.
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In our life too, there are moments of choice when we are confronted on αll sides with negative thoughts and possibilities. What we must not do is take our eyes off the ball. We must remain focused on the issue at hand.
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Some thoughts are so powerful that they overcome us and overwhelm us. 
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*Maybe we can learn something from the deer.*
The priority of the deer, in that given moment was simply to give birth to a baby.The rest was not in her hands and any action or reaction that changed her focus would have likely resulted in death or disaster.
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*Ask yourself:*
*Where is my focus?*
*Where is my faith and hope?*
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God wants us to have faith and to increase our faith. But how? It’s not something we can just wish for or work up on our own. How can we grow in faith?

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First, what is faith?

Faith is an unshakable belief in God and the promises of God. Faith also involves God’s commands. We’re expected to put such confidence in everything God tells us to do that we actually do it!
So how do we dishonor God by a lack of faith? When we disbelieve God, we are in essence saying to God, “I don’t really believe You’ll do exactly what You say you will do. And I don’t really believe that You are what You say You are.”
And God’s response to that is, “I am a promise-keeping God!”
So a lack of faith insults God. God has never failed once—He’s always kept the promises He’s made to human beings. And He always will! (Provided, of course, that we meet the conditions He outlines.)
Faith is one of the key qualities God is looking for in us, so it only makes sense that we make sure we have it.
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*In the midst of any storm, do keep faith in the Creator always. He will never ever disappoint you. NEVER.*
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*Remember, He neither slumbers nor sleeps!! The strong person knows how to keep their life in order*. *Even with tears in their eyes, they still manage to say "I'm ok" with a smile*. 
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*I send this to you because you are a strong person. That was why God heard your prayers and said hard times are over.
If you believe in Him share this to all the people that 👍matter in your life*. 
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*Be honest and send this to anyone who makes you smile*

Wednesday, 19 July 2017

गाय के घी के ज़बर्दस्त फायदे

गाय के घी के ज़बर्दस्त फायदे
आमतौर पर घी को खाने का स्वाद बढ़ाने के लिए यूज किया जाता है। लेकिन आयुर्वेद में इसके कई हेल्थ बेनिफिट्स दिए गए हैं। इसे रेग्युलर एक चम्मच खाने से कई बीमारियों और परेशानियों को दूर किया जा सकता है। आयुर्वेदाचार्य डॉ. बी. एस. राठौर बता रहे हैं देसी घी के हेल्थ पर होने वाले फायदों के बारे में।
घी के फायदे –
पोषक तत्वों से है भरपूर
घी में शॉर्ट चेन फैटी एसिड होते हैं, जिसे पचाना बेहद आसाना होता है और ये हमारे हार्मोन्स के लिए भी फायदेमंद होते हैं. घी में विटामिन ए, डी, कैल्शियम, फॉस्फोरस, मिनरल्स, पोटैशियम जैसे कई पोषक तत्व पाए जाते हैं, जो आपको ज्यादा समय तक जवान बनाए रखते हैं.
युवावस्था रखे कायम
एक ग्लास दूध में एक चम्मच गाय का देसी घी और मिश्री मिलाकर पीने से शारीरिक और मानसिक कमज़ोरी दूर होती है. गर्भवती महिला के घी खाने से उसका बच्चा मज़बूत और बुद्धिमान बनता है. इतना ही नहीं काली गाय का घी खाने से बूढ़ा इंसान भी जवान नज़र आने लगता है.
वजन करता है कंट्रोल
घी में एंटीऑक्सीडेंट भरपूर मात्रा में पाया जाता है. जो शरीर के वजन को नियंत्रित रखने में मदद करता है. शरीर का वजन नियंत्रित हो तो किसी तरह की बीमारी कि चिंता भी नहीं सताती.
आंखों के लिए है फायदेमंद
अगर कोई आंखों की किसी समस्या से पीड़ित है तो उसे एक चम्मच गाय के घी में एक चौथाई काली मिर्च मिलाकर सुबह खाली पेट व रात को सोते समय खाना चाहिए. इसके बाद एक ग्लास ग्रम दूध पीना चाहिए.
कैंसर से लड़ने में करता है मदद 
खाने का स्वाद बढ़ाने के साथ ही गाय के घी में कैंसर से लड़ने के विशेष गुण पाए जाते हैं. यह कैंसर की गांठ को बढ़ने से रोकता है. इसके रोज़ाना सेवन से कैंसर होने की संभावना बहुत कम हो जाती है.
थकान और कमजोरी होती है दूर
शरीर में कमज़ोरी या थकान महसूस होने पर एक ग्लास गुनगुने दूध में गाय का घी मिलाकर पीने से थकान और कमज़ोरी बहुत जल्दी दूर हो जाती है. घी के उपयोग से मांसपेशियां और हड्डियां मज़बूत होती है.
कॉलेस्ट्रॉल को करता है कम
लगातार घी खाने से खून और आंतों में मौजूद कॉलेस्ट्रॉल कम होने लगता है. देसी घी शरीर में बैड कॉलेस्ट्रॉल के लेवल को कम करता है और गुड कॉलेस्ट्रॉल को बढ़ाने में मदद करता है.
पाचन क्रिया होती है ठीक
घी पेट के एसिड्स के बहाव को बढ़ाने का काम करता है. जिससे पाचन क्रिया ठीक होती है. देशी घी शरीर में जमा फैट को गलाकर विटामिन में बदलने का काम करता है. खाने में देशी घी मिलाकर खाने से खाना जल्दी डाइजेस्ट होता है और मेटाबॉल्जिम की प्रक्रिया को बढ़ाता है.
दिल के लिए लाभदायक
गाय का घी दिल समेत कई बीमारियों को दूर भगाने में मदद करता है. जिस शख्स को हार्ट अटैक की तकलीफ है और चिकनाई खाने को मनाही है, उसे गाय का घी खाना चाहिए, इससे दिल मज़बूत होता है.
एंटीऑक्सिडेंट से भरपूर है घी
गाय के घी में भरपूर मात्रा में एंटीऑक्सीडेंट पाया जाता है, जो फ्री रेडिक्ल से लड़ता है और चेहरे की चमक को बरकरार रखता है. घी त्वचा को मुलायम बनाता है और उसे नमी प्रदान करता है. देशी घी से चेहरे पर मसाज करने से निखार बढ़ता है.
● देसी गाय के घी को रसायन कहा गया है। जो जवानी को कायम रखते हुए, बुढ़ापे को दूर रखता है। गाय का घी खाने से बूढ़ा व्यक्ति भी जवान जैसा हो जाता है। गाय के घी में स्वर्ण छार पाए जाते हैं जिसमे अदभुत औषधिय गुण होते है, जो की गाय के घी के इलावा अन्य घी में नहीं मिलते
गाय के घी से बेहतर कोई दूसरी चीज नहीं है। गाय के घी में वैक्सीन एसिड, ब्यूट्रिक एसिड, बीटा-कैरोटीन जैसे माइक्रोन्यूट्रींस मौजूद होते हैं। जिस के सेवन करने से कैंसर जैसी गंभीर बीमारी से बचा जा सकता है। गाय के घी से उत्पन्न शरीर के माइक्रोन्यूट्रींस में कैंसर युक्त तत्वों से लड़ने की क्षमता होती है।
यदि आप गाय के 10 ग्राम घी से हवन अनुष्ठान (यज्ञ) करते हैं तो इसके परिणाम स्वरूप वातावरण में लगभग 1 टन ताजा ऑक्सीजन का उत्पादन कर सकते हैं। यही कारण है कि मंदिरों में गाय के घी का दीपक जलाने कि तथा, धार्मिक समारोह में यज्ञ करने कि प्रथा प्रचलित है। इससे वातावरण में फैले परमाणु विकिरणों को हटाने की अदभुत क्षमता होती है।
》 गाय के घी के अन्य महत्वपूर्ण उपयोग :–
1.गाय का घी नाक में डालने से पागलपन दूर होता है।
2.गाय का घी नाक में डालने से एलर्जी खत्म हो जाती है।
3.गाय का घी नाक में डालने से लकवा का रोग में भी उपचार होता है।
4) 20-25 ग्राम घी व मिश्री खिलाने से शराब, भांग व गांझे का नशा कम हो जाता है।
5) गाय का घी नाक में डालने से कान का पर्दा बिना ओपरेशन के ही ठीक हो जाता है।
6) नाक में घी डालने से नाक की खुश्की दूर होती है और दिमाग तारो ताजा हो जाता है।
7) गाय का घी नाक में डालने से कोमा से बहार निकल कर चेतना वापस लोट आती है।
8) गाय का घी नाक में डालने से बाल झडना समाप्त होकर नए बाल भी आने लगते है
9) गाय के घी को नाक में डालने से मानसिक शांति मिलती है, याददाश्त तेज होती है।
10) हाथ पाव मे जलन होने पर गाय के घी को तलवो में मालिश करें जलन ढीक होता है
11) हिचकी के न रुकने पर खाली गाय का आधा चम्मच घी खाए, हिचकी स्वयं रुक जाएगी।
12) गाय के घी का नियमित सेवन करने से एसिडिटी व कब्ज की शिकायत कम हो जाती है।
13) गाय के घी से बल और वीर्य बढ़ता है और शारीरिक व मानसिक ताकत में भी इजाफा होता है
14) गाय के पुराने घी से बच्चों को छाती और पीठ पर मालिश करने से कफ की शिकायत दूर हो जाती है।
15) अगर अधिक कमजोरी लगे, तो एक गिलास दूध में एक चम्मच गाय का घी और मिश्री डालकर पी लें।
16) हथेली और पांव के तलवो में जलन होने पर गाय के घी की मालिश करने से जलन में आराम आयेगा।
17) गाय का घी न सिर्फ कैंसर को पैदा होने से रोकता है और इस बीमारी के फैलने को भी आश्चर्यजनक ढंग से रोकता है।
18) जिस व्यक्ति को हार्ट अटैक की तकलीफ है और चिकनाइ खाने की मनाही है तो गाय का घी खाएं, हर्दय मज़बूत होता है।
19) देसी गाय के घी में कैंसर से लड़ने की अचूक क्षमता होती है। इसके सेवन से स्तन तथा आंत के खतरनाक कैंसर से बचा जा सकता है।
20) संभोग के बाद कमजोरी आने पर एक गिलास गर्म दूध में एक चम्मच देसी गाय का घी मिलाकर पी लें। इससे थकान बिल्कुल कम हो जाएगी।
21) फफोलो पर गाय का देसी घी लगाने से आराम मिलता है।गाय के घी की झाती पर मालिस करने से बच्चो के बलगम को बहार निकालने मे सहायक होता है।
22) सांप के काटने पर 100 -150 ग्राम घी पिलायें उपर से जितना गुनगुना पानी पिला सके पिलायें जिससे उलटी और दस्त तो लगेंगे ही लेकिन सांप का विष कम हो जायेगा।
23) दो बूंद देसी गाय का घी नाक में सुबह शाम डालने से माइग्रेन दर्द ढीक होता है। सिर दर्द होने पर शरीर में गर्मी लगती हो, तो गाय के घी की पैरों के तलवे पर मालिश करे, सर दर्द ठीक हो जायेगा।
24) यह स्मरण रहे कि गाय के घी के सेवन से कॉलेस्ट्रॉल नहीं बढ़ता है। वजन भी नही बढ़ता, बल्कि वजन को संतुलित करता है । यानी के कमजोर व्यक्ति का वजन बढ़ता है, मोटे व्यक्ति का मोटापा (वजन) कम होता है।
25) एक चम्मच गाय का शुद्ध घी में एक चम्मच बूरा और 1/4 चम्मच पिसी काली मिर्च इन तीनों को मिलाकर सुबह खाली पेट और रात को सोते समय चाट कर ऊपर से गर्म मीठा दूध पीने से आँखों की ज्योति बढ़ती है।
26) गाय के घी को ठन्डे जल में फेंट ले और फिर घी को पानी से अलग कर ले यह प्रक्रिया लगभग सौ बार करे और इसमें थोड़ा सा कपूर डालकर मिला दें। इस विधि द्वारा प्राप्त घी एक असर कारक औषधि में परिवर्तित हो जाता है जिसे जिसे त्वचा सम्बन्धी हर चर्म रोगों में चमत्कारिक मलहम कि तरह से इस्तेमाल कर सकते है। यह सौराइशिस के लिए भी कारगर है।
27) गाय का घी एक अच्छा(LDL)कोलेस्ट्रॉल है। उच्च कोलेस्ट्रॉल के रोगियों को गाय का घी ही खाना चाहिए। यह एक बहुत अच्छा टॉनिक भी है। अगर आप गाय के घी की कुछ बूँदें दिन में तीन बार,नाक में प्रयोग करेंगे तो यह त्रिदोष (वात पित्त और कफ) को संतुलित करता है।
28) घी, छिलका सहित पिसा हुआ काला चना और पिसी शक्कर (बूरा) तीनों को समान मात्रा में मिलाकर लड्डू बाँध लें। प्रातः खाली पेट एक लड्डू खूब चबा-चबाकर खाते हुए एक गिलास मीठा कुनकुना दूध घूँट-घूँट करके पीने से स्त्रियों के प्रदर रोग में आराम होता है, पुरुषों का शरीर मोटा ताजा यानी सुडौल और बलवान बनता है।
गाय का घी और चावल की आहुती डालने से महत्वपूर्ण गैसे जैसे – एथिलीन ऑक्साइड, प्रोपिलीन ऑक्साइड, फॉर्मल्डीहाइड आदि उत्पन्न होती हैं । इथिलीन ऑक्साइड गैस आजकल सबसे अधिक प्रयुक्त होनेवाली जीवाणुरोधक गैस है, जो शल्य-चिकित्सा (ऑपरेशन थियेटर) से लेकर जीवनरक्षक औषधियाँ बनाने तक में उपयोगी हैं ।
वैज्ञानिक प्रोपिलीन ऑक्साइड गैस को कृत्रिम वर्षो का आधार मानते है । आयुर्वेद विशेषज्ञो के अनुसार अनिद्रा का रोगी शाम को दोनों नथुनो में गाय के घी की दो – दो बूंद डाले और रात को नाभि और पैर के तलुओ में गौघृत लगाकर लेट जाय तो उसे प्रगाढ़ निद्रा आ जायेगी ।
गौघृत में मनुष्य – शरीर में पहुंचे रेडियोधर्मी विकिरणों का दुष्प्रभाव नष्ट करने की असीम क्षमता हैं । अग्नि में गाय का घी कि आहुति देने से उसका धुआँ जहाँ तक फैलता है, वहाँ तक का सारा वातावरण प्रदूषण और आण्विक विकरणों से मुक्त हो जाता हैं । सबसे आश्चर्यजनक बात तो यह है कि एक चम्मच गौघृत को अग्नि में डालने से एकटन प्राणवायु (ऑक्सीजन) बनती हैं जो अन्य किसी भी उपाय से संभव नहीं हैं।
भैंस के दूध के मुकाबले गाय के घी में वसा की मात्रा कम होती है। घी घर पर तैयार करना अच्छा होता है। इसे इतना बनाएं कि वह जल्दी ही खत्म हो जाए। बाद में फिर बना सकते हैं। गाय के दूध में सामान्य दूध की ही तरह ही प्रदूषण का असर हो सकता है, मसलन कीटनाशक और कृत्रिम खाद के अंश चारे के साथ गाय के पेट में जा सकते हैं। जैविक घी में इस तरह के प्रदूषण से बचने की कोशिश की जाती है। यदि संभव हो तो गाय के दूध में कीटनाशकों और रासायनिक खाद के अंश की जांच कराई जा सकती है।
यदि आप स्वस्थ हैं तो घी जरूर खाएं, क्योंकि यह मक्खन से अधिक सुरक्षित है। इसमें तेल से अधिक पोषक तत्व हैं। आपने पंजाब और हरियाणा के निवासियों को देखा होगा। वे टनों घी खाते हैं, लेकिन सबसे अधिक फिट और मेहनती हैं। यद्यपि घी पर अभी और शोधों के नतीजे आने शेष हैं, लेकिन प्राचीनकाल से ही आयुर्वेद में अल्सर, कब्ज, आंखों की बीमारियों के साथ त्वचा रोगों के इलाज के लिए घी का प्रयोग किया जाता है।
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Monday, 17 July 2017

3 ऐसे भक्त, जिनके शरीर का प्रियतम प्यारे से मिलन हो गया था।

*3 ऐसे भक्त, जिनके शरीर का कुछ भी पता नहीं चल सका* 
*कबीरदास* (1398-1518)— 1518 में कबीर ने काशी के पास मगहर में देह त्याग दी। ऐसा माना जाता है कि उनकी मृत्यु के बाद उनके शव को लेकर विवाद उत्पन्न हो गया था। हिन्दू कहते थे कि उनका अंतिम संस्कार हिन्दू रीति से होना चाहिए और मुस्लिम कहते थे कि मुस्लिम रीति से। इसी विवाद के चलते जब समाधि कमरे के दरवाजे को खोला गया, तो वहाँ केवल दो फूल थे जो अंतिम संस्कार के लिये उनके हिन्दू और मुस्लिम अनुयायियों के बीच बाँट दिया गया। मुसलमानों ने मुस्लिम रीति से और हिंदुओं ने हिंदू रीति से उन फूलों का अंतिम संस्कार किया। 
कवि कबीर दास के बारे में ऐसा माना जाता है कि उन्होंने अपने मरने की जगह खुद से चुनी थी, मगहर, जो लखनउ शहर से 240 किमी दूरी पर स्थित है। लोगों के दिमाग से मिथक को हटाने के लिये उन्होंने ये जगह चुनी थी उन दिनों, ऐसा माना जाता था कि जिसकी भी मृत्यु मगहर में होगी वो अगले जन्म में बंदर बनेगा और साथ ही उसे स्वर्ग में जगह नहीं मिलेगी। कबीर दास की मृत्यु काशी के बजाय मगहर में केवल इस वजह से हुयी थी क्योंकि वो वहाँ जाकर लोगों के अंधविश्वास और मिथक को तोड़ना चाहते थे। इससे जुड़ा उनका एक खास कथन है कि “जो कबीरा काशी मुएतो रामे कौन निहोरा” अर्थात अगर स्वर्ग का रास्ता इतना आसान होता तो पूजा करने की जरुरत क्या है।
*चैतन्य महाप्रभु* (1486-1534)— 15 जून, 1534 को ४८ वर्ष की उम्र में रथयात्रा के दिन जगन्नाथपुरी में संकीर्तन करते हुए वह जगन्नाथ जी में लीन हो गए और शरीर का कुछ भी पता नहीं चल सका I लेकिन  उनका नाम सदा अमर रहेगा। भक्ति की उन्होंने जो धारा बहाई, वह कभी नहीं सूखेगी और लोगों को हमेशा पवित्र करती रहेगी।
चैतन्य महाप्रभु (१८ फरवरी, १४८६-१५३४) वैष्णव धर्म के भक्ति योग के परम प्रचारक एवं भक्तिकाल के प्रमुख कवियों में से एक हैं। इन्होंने वैष्णवों के गौड़ीय संप्रदाय की आधारशिला रखी, भजन गायकी की एक नयी शैली को जन्म दिया तथा राजनैतिक अस्थिरता के दिनों में हिंदू-मुस्लिम एकता की सद्भावना को बल दिया, जाति-पांत, ऊंच-नीच की भावना को दूर करने की शिक्षा दी तथा विलुप्त वृंदावन को फिर से बसाया और अपने जीवन का अंतिम भाग वहीं व्यतीत किया। 
हरे कृष्ण हरे कृष्ण, कृष्ण कृष्ण हरे हरे, हरे राम हरे राम, राम राम हरे हरे !!
*मीराबाई* (1498-1547)— मीराबाई बहुत दिनों तक वृन्दावन में रहीं और जीवन के अंतिम दिनों में द्वारका चली गईं। जहाँ 1547 ई. में वह नाचते-नाचते श्री रणछोड़राय जी के मन्दिर के गर्भग्रह में प्रवेश कर गईं और मन्दिर के कपाट बन्द हो गये। जब द्वार खोले गये तो देखा कि मीरा वहाँ नहीं थी। उनका चीर मूर्ति के चारों ओर लिपट गया था और मूर्ति अत्यन्त प्रकाशित हो रही थी। मीरा मूर्ति में ही समा गयी थीं। मीराबाई का शरीर भी कहीं नहीं मिला।...
मीरा की मृत्यु को लेकर कई तरह की बाते बताई जाती है। जिनमें कहा जाता है कि लूनवा के भूरदान ने मीरा की मौत 1546 में बताई, जबकि रानीमंगा के भाट ने मीरा की मौत 1548 में बताया तो वहीं डा० शेखावत अपने लेख और खोज के अधार पर मीरा की मौत 1547 में बताते हैं|
ये भी कहा जाता है जब उदयसिंह राजा बने तो उन्हें यह जानकर बहुत निराशा हुई कि उनके परिवार में एक महान भक्त के साथ कैसा दुर्व्यवहार हुआ। तब उन्होंने अपने राज्य के कुछ ब्राह्मणों को मीराबाई को वापस लाने के लिए द्वारका भेजा। जब मीराबाई आने को राजी नहीं हुईं तो ब्राह्मण जिद करने लगे कि वे भी वापस नहीं जायेंगे। उस समय द्वारका में 'कृष्ण जन्माष्टमी' आयोजन की तैयारी चल रही थी। मीराबाई ने कहा कि वे आयोजन में भाग लेकर चलेंगी। उस दिन उत्सव चल रहा था। भक्तगण भजन में मग्न थे। मीरा नाचते-नाचते श्री रणछोड़राय जी के मन्दिर के गर्भग्रह में प्रवेश कर गईं और मन्दिर के कपाट बन्द हो गये। जब द्वार खोले गये तो देखा कि मीरा वहाँ नहीं थी। उनका चीर मूर्ति के चारों ओर लिपट गया था और मूर्ति अत्यन्त प्रकाशित हो रही थी। मीरा मूर्ति में ही समा गयी थीं। मीराबाई का शरीर भी कहीं नहीं मिला। उनका उनके प्रियतम प्यारे से मिलन हो गया था।

हरि हरि बोल🙏🏻💐🌹💐🙏🏻

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हम रोज़ नहीं देखते कि कोई भी किसी की बदले में किसी चीज की उम्मीद किए बिना दूसरों की मदद नहीं करता । लेकिन श्री हरखचंद सावला, 57, एक ऐसा सही उदाहरण है। वह मुंबई के विभिन्न अस्पतालों में भर्ती कैंसर के रोगियों को साथ ही उनके रिश्तेदारों को आवास प्रदान करता है और भोजन और दवाइयां प्रदान करता है । करीब तीस साल का एक युवक मुंबई के प्रसिद्ध टाटा कैंसर अस्पताल के सामने फुटपाथ पर खड़ा था। युवक वहां अस्पताल की सीढिय़ों पर मौत के द्वार पर खड़े मरीजों को बड़े ध्यान दे देख रहा था, जिनके चेहरों पर दर्द और विवषता का भाव स्पष्ट नजर आ रहा था। इन रोगियों के साथ उनके रिश्तेदार भी परेशान थे। थोड़ी देर में ही यह दृष्य युवक को परेशान करने लगा। वहां मौजूद रोगियों में से अधिकांश दूर दराज के गांवों के थे, जिन्हे यह भी नहीं पता था कि क्या करें, किससे मिले? इन लोगों के पास दवा और भोजन के भी पैसे नहीं थे।
टाटा कैंसर अस्पताल के सामने का यह दृश्य देख कर वह तीस साल का युवक भारी मन से घर लौट आया। 
उसने यह ठान लिया कि इनके लिए कुछ करूंगा। कुछ करने की चाह ने उसे रात-दिन सोने नहीं दिया। अंतत: उसे एक रास्ता सूझा..उस युवक ने अपने होटल को किराये पर देक्रर कुछ पैसा उठाया। उसने इन पैसों से ठीक टाटा कैंसर अस्पताल के सामने एक भवन लेकर धर्मार्थ कार्य (चेरिटी वर्क) शुरू कर दिया। उसकी यह गतिविधि अब 27 साल पूरे कर चुकी है और नित रोज प्रगति कर रही है। उक्त चेरिटेबिल संस्था कैंसर रोगियों और उनके रिश्तेदारों को निशुल्क भोजन उपलब्ध कराती है। उनकी सहायता करने के लिए उनकी सहायता करने के लिए प्रतिबद्ध, उन्होंने लगभग 25 लोगों को भोजन देने की शुरुआत की। आज, यह ट्रस्ट दैनिक भोजन पर करीब 700 लोगों को गरम भोजन प्रदान करता है। 
हल्दीयुक्त दूध के साथ कैंसर के रोगियों के लिए विशेष रूप से खाना तैयार किया जाता है जो कठोर केमोथेरेपी सत्र से गुजर चुके हैं या गले के कैंसर से पीड़ित हैं 
जैसे जैसे  25 लोगों से शुरू किए गए इस कार्य में संख्या लगातार बढ़ती गई। मरीजों की संख्या बढऩे पर मदद के लिए हाथ भी बढऩे लगे। सर्दी, गर्मी, बरसात हर मौसम को झेलने के बावजूद यह काम नहीं रूका। 
यह पुनीत काम करने वाले युवक का नाम था हरकचंद सावला। 
ये आदमी हमेशा एक चमचमाते सफेद कुर्ते और पायजामा में तैयार होता है, जो सफेद चप्पल या जूते के साथ अपने रूप को पूरा करता है। उन्हें मुंबई के टाटा मेमोरियल अस्पताल के पीछे एक लेन में देखा जा सकता है या फिर कैंसर रोगियों और उनके रिश्तेदारों को दैनिक आधार पर भोजन का वितरण या उनके तंत्रिकाओं को शांत करने के लिए उनसे बात कर रहा होता है ।
वह कहते है कि जब मैंने फैसला किया कि मैं इन लोगों की मदद करुँगा , तब वह याद करते है। ऐसा करने के लिए, उन्होंने अपना व्यवसाय छोड़ने का फैसला किया - जिसने उसके रिश्तेदारों को चकित किया। "उन्होंने सोचा कि मैं पागल हो गया हूँ  लेकिन इस समय मेरी पत्नी मेरी प्रेरणा और सहायता थी। मैंने इन लोगों के लिए मुफ्त भोजन का वितरण करना शुरू कर दिया और 12 वर्षों तक मैने अपने पैसों से भुगतान किया। उसके बाद, लोगों ने पैसा, पुराने कपड़े, खिलौने या दोपहर का भोजन या मिठाई प्रायोजित करने में मदद करना शुरू कर दिया,
एक काम में सफलता मिलने के बाद हरकचंद सावला जरूरतमंदों को निशुल्क दवा की आपूर्ति शुरू कर दिए। 
इसके लिए उन्होंने मैडीसिन बैंक बनाया है, जिसमें तीन डॉक्टर और तीन फार्मासिस्ट स्वैच्छिक सेवा देते हैं। इतना ही नहीं कैंसर पीडि़त बच्चों के लिए खिलौनों का एक बैंक भी खोल दिया गया है। आपको जान कर आश्चर्य होगा कि सावला द्वारा कैंसर पीडि़तों के लिए स्थापित 'जीवन ज्योतÓ ट्रस्ट आज 60 से अधिक प्रोजेक्ट पर काम कर रहा है। 
57 साल की उम्र में भी सावला के उत्साह और ऊर्जा 27 साल पहले जैसी ही है। 
मानवता के लिए उनके योगदान को नमन करने की जरूरत है। 
प्रबंधन ट्रस्टी के रूप में, श्री सावला ने इसे देश के तीन और शहरों, अर्थात् मुंबई, जलगांव और कोलकाता तक बढ़ा दिया है। बहुत ही शुरुआती जीवन से, वह गरीब और जरूरतमंदों के प्रति संवेदनशील थे। अपने ट्रस्ट की वेबसाइट के अनुसार, साल्वे एक बच्चे के रूप में अपने बस यात्रा व्यय को अपने दोस्तों में से एक के लिए स्कूल की फीस देने के लिए इस्तेमाल करता था जो भुगतान नहीं कर सके थे। ट्रस्ट अपनी सेवाओं का विस्तार भी कर रहा है ताकि कैंसर के मरीज अपने संघर्षों, भावनात्मक और आर्थिक रूप से दोनों के साथ निपट सकें। मरीजों का एक नेटवर्क बनाया गया है, जहां लोग अपने अप्रयुक्त और असमाप्त दवाओं का दान करते हैं, जो अस्पतालों को गरीब कैंसर रोगियों के लिए मुफ्त वितरण के लिए दिया जाता है। जीवन ज्योति अपने तरीकों के लिए लोगों को दान करने के लिए प्रोत्साहित करने के तरीकों पर नवाचार कर रहा है। ऐसे लोगों के नाम जो कपड़े, दवा या नकदी में योगदान करते हैं, एक स्थानीय जैन अखबार में प्रशंसा के रूप में प्रकाशित होते हैं और दूसरों को इस कारण के लिए दान करने के लिए प्रोत्साहित करते हैं। ट्रस्ट गरीब लोगों के लिए दवाइयों को खरीदने के लिए उन्हें बेचने के लिए पुराने लोगों को भी लेता है। एक खिलौना बैंक भी बनाया गया है जहां लोग खिलौने का योगदान करते हैं जो कैंसर से ग्रस्त बच्चों को दिया जाता है। इसके अतिरिक्त, एक दिन की पिकनिक जैसी नियमित गतिविधियां, बच्चों और मरीजों के लिए कैंसर से लड़ने में उनकी मदद करने के लिए योजना बनाई गई हैं। ट्रस्ट ने रोगियों के परामर्श और पुनर्वास के लिए अपनी सेवाओं का विस्तार भी किया है जो ठीक हो चुके हैं या बीमारी के अंतिम चरण में हैं। आगे की बीमारी के मूल कारण में जाकर, यह ट्रस्ट जन जागरूकता अभियान चलाता है और कैंसर का पता लगाने शिविर का संचालन कैंसर की जल्दी पहचान और रोकथाम करता है। 
मुफ्त भोजन, दवाइयां, वॉकर और व्हील चेयर प्रदान करने के अलावा, हरखचंद ने शवों  का अंतिम संस्कार भी  करते  जो कि उनके परिवारों द्वारा छोड़े गए हैं, या जिनके पास अंतिम संस्कार करने के लिए कोई धन नहीं है। वह कहते हैं  है कि वे अंत चरण के कैंसर के रोगियों के लिए एक अस्पताल बनाना चाहते हैं, जो इलाज की लागत का खर्च नहीं उठा पा रहे हैं या जो उनके परिवारों द्वारा त्याग रहे हैं  वह कहते हैं "मैं एक बूढ़ा घर का निर्माण करना चाहता हूं जहां शारीरिक विकलांगता या पक्षाघात के साथ उन लोगों को शून्य लागत पर उचित देखभाल दी जाती है,",
यह विडंबना ही है कि आज लोग 20 साल में 200 टेस्ट मैच खेलने वाले सचिन को कुछ शतक और तीस हजार रन बनाने के लिए भगवान के रूप में देखते हैं।
जबकि 10 से 12 लाख कैंसर रोगियों को मुफ्त भोजन कराने वाले को कोई जानता तक नहीं।
यहां मीडिया की भी भूमिका पर सवाल है, जो सावला जैसे लोगों को नजर अंदाज करती है।
यह हमे समझना होगा कि पंढरपुर, शिरडी में साई मंदिर, तिरुपति बाला जी आदि स्थानों पर लाखों रुपये दान करने से भगवान नहीं मिलेगा। 
भगवान हमारे आसपास ही रहता है। लेकिन हम बापू, महाराज या बाबा के रूप में विभिन्न स्टाइल देव पुरुष के पीछे पागलों की तरह चल रहे हैं। 
इसके बाजवूद जीवन में कठिनाइयां कम नहीं हो रही हैं और मृत्यु तक यह बनी रहेगी।
परतुं बीते 27 साल से कैंसर रोगियों और उनके रिश्तेदारों को हरकचंद सावला के रूप में भगवान ही मिल गया है।
इस संदेश को अधिक से अधिक लोगों तक पहुंचाएं ताकि हरकचंद्र सावला को उनके हिस्से की प्रसिद्धि मिल सके और ऐसे कार्य करने वालो को बढावा मिले
ये सवाल भी है की क्या भारत रत्न के हक़दार हरकचंद्र सावला जैसे लोग हैं या सचिन तेन्दुलकर, राजीव गाँधी जैसे लोग।
धन्यवाद 👏
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Sunday, 16 July 2017

सीएफ़एल (CFL) की कमियाँ संभावित एवं कुप्रभावों व दुर्घटनाओं से संबंधित विश्वस्नीय जानकारी

ये कहानी
कनाडा के रहने वाले स्मिथ की है,जिनका पैर अब काटा जाना है. इन्हें CFL बल्ब का इस्तेमाल या यूँ कहें कि इस्तेमाल में की गई लापरवाही बहुत भारी पड़ी. हम सब जानते हैं कि CFL बल्ब कितनी बिजली बचाते हैं, लेकिन ज़्यादातर लोग यह नहीं जानते कि इन बल्बों में पारा पाया जाता है, जो कि शरीर में चले जाने पर बहुत ही घातक साबित होता है.
स्मिथ ने ऐसे ही एक बल्ब के ठन्डे होने का इन्तज़ार नहीं किया और उसे होल्डर से निकालकर बदलने की कोशिश करते हुए उसे ज़मीन पर गिरा डाला. ज़मीन पर गिरते ही बल्ब टूट गया और काँच के टुकड़े बिखर गए.
स्मिथ नंगे पैर थे और अंधेरे में उनका पैर काँच के एक टुकड़े पर पड़ गया और बल्ब में उपस्थित पारा घाव के माध्यम से शरीर में प्रवेश कर गया. उन्हें 2 महीने ICU में रखा गया और अब उन्हें अपने पैर को खो देने का डर है.
बिजली की कमी और इसकी बढ़ती लागत को ध्यान में रखते हुए बिजली की बचत के लिये सीएफ़एल बल्ब और ट्यूब लगाना समय की आवश्यकता है इसलिये इन्हें लगाएं ज़रूर पर इसके साथ ही इसके ख़तरों से जागरूक रहते हुए अपने स्वयं के और अपने परिजनों के स्वास्थ्य के प्रति सजग रहना न भूलें। बिजली बचत करने वाले इन सीएफ़एल बल्बों के परिचय, उपयोगिता, संभावित कुप्रभावों व दुर्घटनाओं से संबंधित विश्वस्नीय जानकारी और इंगलैंड के पर्यावरण, आहार और ग्रामीण विभाग ने इनको काम में लेते समय वांछित सावधानियों का जो चेतावनी पत्र जारी किया है, उन पर आधारित पूरा लेख आगे पढ़िये।
1. प्रस्तावना –
पिछले कुछ वर्षों से हमें यह बताया जा रहा है कि सीएफ़एल बल्ब और ट्यूब लगाने से बिजली की बचत होती है तथा इनकी उम्र भी ज़्यादा होती है। इसलिये मँहगा होते हुए भी ऐसे बल्बों का प्रचलन हमारे देश भारत में बढ़ता जा रहा है। विदेशों में यह प्रचलन काफ़ी पहले ही बढ़ चुका था और इस कारण इसके कुप्रभाव भी पहले वहाँ पर सामने आये हैं। विदेशों में तो ऐसे बल्बों के ख़राब होने के बाद सुरक्षित पुनर्चक्रण की पुख़्ता व्यवस्था है लेकिन हमारे देश में ऐसी कोई व्यवस्था नहीं है। इस कारण हमारे यहाँ कुप्रभावों की संभावना और भी ज्यादा है जिसे देखते हुए हमें सजग रहने की आवश्यकता है।
सीएफ़एल की तकनीक –
सीएफ़एल के दो मुख्य भाग होते हैं – इलेक्ट्रोनिक बेलास्ट और गैस भरी ट्यूब। बेलास्ट में एक रेक्टिफ़ायर वाला सर्किट बोर्ड, एक फ़िल्टर केपेसिटर और दो स्विचिंग ट्रांज़िस्टर होते हैं। गैस भरी ट्यूब में फ़ॉस्फ़ोर का मिश्रण होता है जो बेलास्ट से मिलने वाली उच्च आवृति की बिजली से चमक कर प्रकाश देते हैं। फ़ॉस्फ़ोरों की डिजाइन के आधार पर सीएफ़एल सफ़ेद, पीले या अन्य रंग का प्रकाश देते हैं। फ़ॉस्फ़ोर रेयर अर्थ कम्पाउंड (rare earth compounds) हैं। इनका उपयोग सीएफ़एल के अलावा रेडार, केथोड रे ट्यूब व प्लाज़्मा डिस्प्ले स्क्रीन, नियोन साइन, आदि में होता है।
परम्परागत बल्ब बनाम सीएफ़एल –
परम्परागत बल्बों का निर्धारित जीवनकाल लगभग 750 से 1000 घंटे का होता है जबकि सीएफ़एल बल्बों व ट्यूबों का 6000 से 15000 घंटे और साथ ही समान प्रकाश देने के लिये परम्परागत बल्बों की तुलना में सीएफ़एल बिजली की लगभग एक तिहाई खपत ही करते हैं। विकिपीडिया पर उपलब्ध विवरण के अनुसार सन् 2010 में लगभग 50-70% बाज़ार परम्परागत बल्बों का था और अगर इसे शून्य कर पूरे विश्व में केवल सीएफ़एल ही काम में ली जावे तो 409 टैरावॉटऑवर्स {1 टैरावॉटऑवर (TWh) =109किलोवॉटऑवर (KWh)} बिजली की बचत होने का अनुमान है जो विश्व की कुल खपत का 2.5% मात्र है। इस परिस्थिति में पूरे विश्व के कार्बन उत्सर्जन में 23 करोड़ टन की कमी आने का अनुमान है जो नीदरलैंड तथा पुर्तगाल के वर्तमान कार्बन उत्सर्जन के बराबर है। तात्पर्य यह है कि सीएफ़एल लगाने के पीछे ऊर्जा व पर्यावरण संरक्षण का जो मुख्य तर्क दिया जाता है वह समग्र रूप से इसका प्रभाव देखने पर बहुत व़जनी नहीं है।
सीएफ़एल की कमियाँ -
सीएफ़एल की मुख्य कमियाँ निम्न प्रकार से हैं -
1) सीएफ़एल बल्बों व ट्यूबों का उपयोगी जीवनकाल बिजली की गुणवत्ता में कमी, जैसे निर्धारित वोल्टेज में कमी या आधिक्य व इसमें अचानक परिवर्तन, चालू व बंद करने की बारम्बारता (frequency of cycling on and off), कमरे के तापमान, इसे लगाने की दिशा, झटका लगने या गिरने, उत्पादकीय दोष, आदि से उल्लेखनीय रूप से प्रभावित होता है और सामान्यतः मानक जीवनकाल वास्तविकता में नहीं मिल पाता है।उदाहरण के लिये अगर सीएफ़एल को पाँच मिनट तक ही जला कर बंद करने का चक्र रखा जाना है तो सीएफ़एल व परम्परागत बल्बों के जीवनकाल समान ही रहने की संभावना है। अमेरिकन स्टार रेटिंग के दिशा निर्देशों में यह उल्लेख है कि अगर किसी कमरे में लगे सीएफ़एल का उपयोग 15 मिनट से कम के लिये नहीं करना है तो ऐसी स्थिति में उसे बंद करने के बजाय जलता रखा जाना श्रेयस्कर है। (क्योंकि सीएफ़एल को चालू करने में बेलास्ट अतिरिक्त बिजली की खपत करता है और बार बार बंद करने से इसकी उम्र भी घटती है) 
2) सीएफ़एल बल्ब व ट्यूब ज्यों ज्यों पुराने होते जाते हैं ये कम प्रकाश देने लगते हैं और जीवनकाल के अंत तक यह कमी लगभग 25% तक हो जाती है। अमेरिकी ऊर्जा विभाग के एक परीक्षण में कुल परीक्षित बल्बों में से 25% निर्धारित जीवनकाल का 40% जीवनकाल बीतने के बाद उन पर लिखे वॉट का प्रकाश नहीं दे सके।
3) सीएफ़एल बल्ब व ट्यूब परम्परागत बल्बों की तुलना में काफ़ी कम उष्मा (heat) उत्सर्जित करते हैं इसलिये गर्म प्रदेशों या गर्मी के दिनों में तो लाभप्रद हैं लेकिन ठंडे प्रदेशों या सर्दी के दिनों में भवन को गर्म करने के लिये अतिरिक्त ऊर्जा चाहिये जिससे ऊर्जा की वास्तविक बचत कम हो जाती है। कनाडा के विनिपेग शहर में इस दृष्टिकोण से की गई गणना के अनुसार ऊर्जा की वास्तविक बचत 75% के स्थान पर 17% ही रह जाती है यह एक अध्ययन में सामने आया है।
4) परम्परागत बल्ब स्विच चालू करते ही पूरा प्रकाश देना शुरू कर देते हैं जबकि सीएफ़एल बल्ब व ट्यूबस्विच चालू करने के लगभग एक सैकंड बाद चालू होते हैं और कई मॉडल पूरा प्रकाश देने में कुछ समय लेते हैं। तापमान कम होने पर यह समय और बढ़ जाता है।
5) परम्परागत बल्ब के प्रकाश को मद्धिमक (dimmer) लगा कर आवश्यकतानुसार मद्धिम (dim) किया जा सकता है जबकि सीएफ़एल बल्ब व ट्यूब में मद्धिमन (dimming) संभव नहीं है।(कुछ विशेष इसी प्रयोजन के मॉडलों के अलावा)
6) सीएफ़एल बल्ब व ट्यूब से अल्ट्रावॉयलेट किरणें निकलती हैं जिनसे इन्फ्रारेड रिमोट कंट्रोल नियंत्रित इलेक्ट्रोनिक उपकरणों की कार्यदक्षता व रंजकयुक्त (having piments & dyes) कपड़ों व चित्रकारियों (paintings) के रंग प्रभावित हो सकते हैं। परम्परागत बल्ब के प्रकाश में ऐसी किरणें नहीं निकलती हैं।
सीएफ़एल का जन स्वास्थ्य और पर्यावरण पर कुप्रभाव –
1) यूरोपियन कमिशन की वैज्ञानिक समिति ने सन् 2008 में यह पाया कि सीएफ़एल बल्ब व ट्यूब से निकलने वाली अल्ट्रावॉयलेट किरणों की निकटता विद्यमान चर्म रोगों को बढ़ा सकती है और आँखों के पर्दे (ratina) को हानि पहुँचा सकती है। यदि दोहरे काँच की सीएफ़एल काम में ली जाय तो यह ख़तरा नहीं रहता है। दोहरे काँच की सीएफ़एल विकसित देशों में बनने लग गई हैं लेकिन भारत में यह प्रचलन आने में समय लग सकता है।
2) हर सीएफ़एल बल्ब व ट्यूब में लगभग 3-5 मिलिग्राम पारा होता है जो कम मात्रा में होने पर भी ज़हर है। सीएफ़एल के ख़राब होने पर हर कहीं फेंक देने पर यह भूमि और भूमिगत जल को प्रदूषित कर देता है जो जन स्वास्थ्य के लिये भारी ख़तरा पैदा करता है। जैविक प्रक्रिया के दौरान यह पारा मिथाइल मरकरी (methylmercury) बन जाता है जो पानी में घुलनशील है और मछलियों के माध्यम से मानव शरीर में प्रवेश करता है। इसका मुख्य कुप्रभाव गर्भवती स्त्रियों पर होता है और परिणाम जन्मजात विकलांगता व न्यूरोविकारके रूप में सामने आते हैं। अमेरिका की नेशनल साइंस एकेडमी के एक अनुमान के अनुसार हर साल 60,000 से अधिक ऐसे बच्चे जन्म लेते हैं जिनकी विकलांगता का कारण मिथाइल मरकरी होता है। भारत में ऐसे कोई अध्ययन हुए हों ऐसी जानकारी नहीं है। विकसित देशों ने कम पारे वाले बल्ब ही उत्पादित करने के मानक निर्धारित कर दिये हैं और बल्ब बनाने व बेचने वालों के लिये इनके खराब होने के बाद वापस एकत्रित कर सुरक्षित पुनर्चक्रण अनिवार्य कर दिया है। वहाँ ऐसे बल्बों की कीमत में पुनर्चक्रण की कीमत भी शामिल की जाती है। भारत में यह प्रचलन आने में कितना समय लगेगा कोई नहीं बता सकता है।
3) ऊर्जा बचाने वाले ये सीएफएल बल्ब अगर देर रात तक जलाए जाते हैं तो इनसे स्तन कैंसर होने का खतरा काफी हद तक बढ़ जाता है क्योंकि इससे शरीर में मेलाटोनीन नाम के हारमोन का बनना काफी हद तक प्रभावित होता है। यह निष्कर्ष इजरायल के हफीफा विश्वविद्यालय के जीवविज्ञान के प्रोफेसर अब्राहम हाइम का है जो ‘क्रोनोबॉयलॉजी इंटरनेशनल’ नाम के जर्नल में प्रकाशित हुआ है।
4) यदि सीएफ़एल बल्ब या ट्यूब घर में टूट जावे और उसका सुरक्षित निस्तारण करने की जानकारी नहीं हो तो इसके गंभीर दुश्परिणाम हो सकते हैं। ऐसी ही एक दुर्घटना में पीड़ित के पाँव की स्थिति गंभीर हो गई थी क्योंकि उसने फूटे बल्ब के काँच पर पाँव रख दिया और पारे का ज़हर सीधा फैल गया ।
अधिकांश विकसित देशों ने इस संबंध में सार्वजनिक दिशा निर्देश जारी कर रखे हैं पर भारत में अभी इसका अभाव है।
CFL के सम्बन्ध में
पारा ही एक ख़तरा नहीं है, कई और भी मसले हैं, लेकिन उनके बारे में फ़िर कभी चर्चा करेंगे. आज जानना ज़रूरी है
कि CFL के टूट जाने पर क्या करें...
१) कभी भी तुरन्त CFL ना बदलें. उसके ठन्डे होने का इन्तज़ार करें.
२) CFL टूट जाने पर तुरन्त कमरे से निकल जाएँ. ध्यान रखें कि पैर काँच के टुकड़े पर ना पड़ जाए.
३) पंखे एसी इत्यादि बन्द कर दें जिससे पारा कहीं भी फैल ना सके.
४) कम से कम १५-२० मिनट बाद कमरे में प्रवेश करके टूटे हुए काँच को साफ़ करें. पंखा बन्द रखें और मुँह को ढाँक कर रखें. दस्ताने पहनें और कार्डबोर्ड की मदद से काँच समेटें. झाड़ू का इस्तेमाल ना करें. क्यूँकि इससे पारे के फ़ैलने का डर रहता है. काँच के बारीक कण टेप की मदद से चिपका कर साफ़ करें.
५) कचरा फेंकने के बाद साबुन से हाथ धोना ना भूलें.
६) यदि किसी कारणवश चोट लग जाए तो तुरन्त चिकित्सक को दिखाएँ और उसे चोट के बारे में सारी जानकारी दें. सीसे और आर्सेनिक से भी कहीं अधिक ज़हरीला और घातक पारा होता है. इसलिए CFL का प्रयोग करते समय बहुत सावधानी रखें.
इस जानकारी को अधिक से अधिक शेयर करें तथा अपने परिचितों को भी बताएँ, ताकि कोई अन्य ऐसी दुर्घटना की चपेट में ना आए.
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_Forwarded as received_.

#5 जून विश्व पर्यावरण दिवस...#

*5 जून विश्व पर्यावरण दिवस...*


पर्यावरण दिवस

विश्व पर्यावरण दिवस को पर्यावरण दिवस और ईको दिवस के नाम भी जाता है। ये वर्षों से एक बड़े वार्षिक उत्सवों में से एक है जो हर वर्ष 5 जून को अनोखे और जीवन का पालन-पोषण करने वाली प्रकृति को सुरक्षित रखने के लक्ष्य के लिये लोगों द्वारा पूरे विश्व भर में मनाया जाता है।
विश्व पर्यावरण दिवस का इतिहास
पूरे विश्व में आम लोगों को जागरुक बनाने के लिये साथ ही कुछ सकारात्मक पर्यावरणीय कार्यवाही को लागू करने के द्वारा पर्यावरणीय मुद्दों को सुलझाने के लिये, मानव जीवन में स्वास्थ्य और हरित पर्यावरण के महत्व के बारे में वैश्विक जागरुकता को फैलाने के लिये वर्ष 1973 से हर 5 जून को एक वार्षिक कार्यक्रम के रुप में विश्व पर्यावरण दिवस (डबल्यूईडी के रुप में भी कहा जाता है) को मनाने की शुरुआत की गयी जो कि कुछ लोगों, अपने पर्यावरण की सुरक्षा करने की जिम्मेदारी सिर्फ सरकार या निजी संगठनों की ही नहीं बल्कि पूरे समाज की जिम्मेदारी है ।
1972 में संयुक्त राष्ट्र में 5 से 16 जून को मानव पर्यावरण पर शुरु हुए सम्मेलन में संयुक्त राष्ट्र आम सभा और संयुक्त राष्ट्र पर्यावरण कार्यक्रम (यूएनइपी) के द्वारा कुछ प्रभावकारी अभियानों को चलाने के द्वारा हर वर्ष मनाने के लिये पहली बार विश्व पर्यावरण दिवस की स्थापना हुयी थी। इसे पहली बार 1973 में कुछ खास विषय-वस्तु के “केवल धरती” साथ मनाया गया था। 1974 से, दुनिया के अलग-अलग शहरों में विश्व पर्यावरण उत्सव की मेजबानी की जा रही है।
विश्व पर्यावरण दिवस अभियान के कुछ लक्ष्य यहाँ दिये गये हैं:
पर्यावरण मुद्दों के बारे में आम लोगों को जागरुक बनाने के लिये इसे मनाया जाता है।
विकसित पर्यावरणीय सुरक्षा उपायों में एक सक्रिय एजेंट बनने के साथ ही साथ उत्सव में सक्रियता से भाग लेने के लिये अलग समाज और समुदाय से आम लोगों को बढ़ावा देते हैं।
उन्हें जानने दो कि पर्यावरणीय मुद्दों की ओर नकारात्मक बदलाव रोकने के लिये सामुदायिक लोग बहुत जरुरी हैं।
सुरक्षित, स्वच्छ और अधिक सुखी भविष्य का आनन्द लेने के लिये लोगों को अपने आसपास के माहौल को सुरक्षित और स्वच्छ बनाने के लिये प्रोत्साहित करना चाहिये।
विश्व पर्यावरण दिवस पर कथन

विश्व पर्यावरण दिवस पर कुछ प्रसिद्ध कथन (प्रसिद्ध व्यक्तियों द्वारा दिये गये) यहाँ दिया गये हैं:
“पर्यावरण सब कुछ है जो मैं नहीं हूँ।”- अल्बर्ट आइंस्टाईन
“पक्षी पर्यावरण की संकेतक होती है। अगर वो परेशानी में है, हम जानते हैं कि हमलोग जल्दी ही परेशानी में होंगे।”- रोजर टोरी पीटर्सन
“भूमि के साथ सौहार्द एक दोस्त के सौहार्द जैसा है; आप उसके दायें हाथ को प्यार करें और बांये हाथ को काट नहीं सकते।”- एल्डो लियोपोल्ड
“आप मर सकते हैं लेकिन कार्बन नहीं; इसका जीवन आपके साथ नहीं मरेगा। ये वापस जमीन में चला जायेगा, और और वहाँ एक पौधा उसे दुबारा से उसी समय में ले सकता है, पौधे और जानवरों के जीवन के एक चक्र पर एक बार उसे दुबारा से भेजें।”- जैकब ब्रोनोस्की
“लोग अपने पर्यावरण को दोषी ठहराते हैं। इसमें केवल एक व्यक्ति को दोषी ठहराना है- और केवल एक- वो खुद।”-रॉबर्ट कॉलियर
“मैं प्रकृति, जानवरों में, पक्षियों में और पर्यावरण में ईशवर को प्राप्त कर सकता हूँ, पैट बकले
“हमें जरुर प्रकृति को लौटाना चाहिये और प्रकृति का ईश्वर।”- लूथर बरबैंक

*विशेष:*
*जाने पेड़ो के बारे मे...*
🍁. पेड़ धरती पर सबसे पुरानें living organism हैं, और ये कभी भी ज्यादा उम्र की वजह से नही मरते.
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🍁. हर साल 5 अऱब पेड़ लगाए जा रहे है लेकिन हर साल 10 अऱब पेड़ काटे भी जा रहे हैं.
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🍁. एक पेड़ दिन में इतनी ऑक्सीजन देता है कि 4 आदमी जिंदा रह सकें.
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🍁.देशों की बात करें, तो दुनिया में सबसे ज्यादा पेड़ रूस में है उसके बाद कनाडा में उसके बाद ब्राज़ील में फिर अमेरिका में और उसके बाद भारत में केवल 35 अऱब पेड़ बचे हैं.
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🍁.दुनिया की बात करें, तो 1 इंसान के लिए 422 पेड़ बचे है. लेकिन अगर भारत की बात करें, तो 1 हिंदुस्तानी के लिए सिर्फ 28 पेड़ बचे हैं.
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🍁. पेड़ो की कतार धूल-मिट्टी के स्तर को 75% तक कम कर देती है. और 50% तक शोर को कम करती हैं.
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🍁. एक पेड़ इतनी ठंड पैदा करता है जितनी 1 A.C 10 कमरों में 20 घंटो तक चलने पर करता है. जो इलाका पेड़ो से घिरा होता है वह दूसरे इलाकों की तुलना में 9 डिग्री ठंडा रहता हैं.
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🍁. पेड़ अपनी 10% खुराक मिट्टी से और 90% खुराक हवा से लेते है. एक पेड़ में एक साल में 2,000 लीटरपानीधरती से चूस लेता हैं.
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🍁. एक एकड़ में लगे हुए पेड़ 1 साल में इतनी Co2 सोख लेते है जितनीएक कार 41,000 km चलने पर छोड़ती हैं.
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🍁. दुनिया की 20% oxygen अमेजन के जंगलो द्वारा पैदा की जाती हैं. ये जंगल 8 करोड़ 15 लाख एकड़ में फैले हुए हैं.
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🍁. इंसानो की तरह पेड़ो को भी कैंसर होती है. कैंसर होने के बाद पेड़ कम ऑक्सीजन देने लगते हैं.
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🍁. पेड़ की जड़े बहुत नीचे तक जा सकती है. दक्षिण अफ्रिका में एक अंजीर के पेड़ की जड़े 400 फीट नीचे तक पाई गई थी.
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🍁. दुनिया का सबसे पुराना पेड़ स्वीडन के डलारना प्रांत में है. टीजिक्कोनाम का यह पेड़ 9,550 साल पुराना है. इसकी लंबाई करीब 13 फीट हैं.
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🍁.किसी एक पेड़ का नाम लेना मुश्किल है लेकिन तुलसी, पीपल, नीम और बरगद दूसरों के मुकाबले ज्यादा ऑक्सीजन पैदा करते हैं. 🙏🙏



*एक संदेश:*
*इस बरसात में कम से कम एक पेड़ अवश्य लगायें...*



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